गोरखपुर
लालटेन की रोशनी से भव्य मंच तक, गंभीरपुर की रामलीला ने पूरे किए 47 वर्ष
1980 में संतों और ग्रामीणों ने की थी शुरुआत, आज भी एक महीने की तैयारी के बाद 12 दिनों तक होता है श्रीराम के जीवन का मंचन
जयदेश। आधुनिकता के दौर में जहां अनेक पारंपरिक आयोजन धीरे-धीरे अपनी पहचान खो रहे हैं, वहीं गोरखपुर शहर से करीब 40 किलोमीटर दूर कौड़ीराम विकासखंड का गंभीरपुर गांव अपनी रामलीला की गौरवशाली परंपरा को सहेजे हुए है। यहां पिछले 47 वर्षों से रामलीला का भव्य आयोजन किया जा रहा है। पांच दशक के करीब पहुंच चुकी यह परंपरा आज भी आसपास के क्षेत्रों के श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण और आस्था का केंद्र बनी हुई है।
1980 में रखी गई थी रामलीला की नींव
गंभीरपुर गांव में रामलीला की शुरुआत वर्ष 1980 में गांव के संत स्व. शंभू शरण सिंह, गोरख सिंह, रमिन्द्र सिंह, स्व. बाबूराम भारती और नवनाथ भट्ट ने मिलकर की थी। आयोजकों का उद्देश्य समाज के हर वर्ग तक भगवान श्रीराम के जीवन, उनकी लीलाओं और मर्यादा पुरुषोत्तम के आदर्शों को पहुंचाना था, ताकि निरक्षर लोग भी धार्मिक प्रसंगों को आसानी से समझ सकें।
संस्थापकों की ओर से शुरू की गई इस परंपरा को अब गांव की नई पीढ़ी पूरे उत्साह के साथ आगे बढ़ा रही है। रामलीला शुरू होने से करीब एक महीने पहले ही कलाकारों का अभ्यास और रिहर्सल शुरू हो जाता है। वर्तमान में आयोजन की व्यवस्था संतोष सिंह संभाल रहे हैं, जबकि समिति के अध्यक्ष मानसिंह हैं।
जब लालटेन की रोशनी में होता था मंचन
समिति के वरिष्ठ सदस्य 78 वर्षीय डॉ. महंत सिंह पुरानी यादों को साझा करते हुए बताते हैं कि शुरुआती दिनों में गांव में बिजली की समुचित व्यवस्था नहीं थी। ऐसे में कलाकार लालटेन की रोशनी में ही रामलीला का मंचन करते थे। सीमित संसाधनों के बावजूद ग्रामीणों का उत्साह और समर्पण कभी कम नहीं हुआ।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1980 में नवरात्र के प्रथम दिन गांव के लोगों ने मिट्टी, पुष्प, दूध और जल लेकर संकल्प लिया था कि रामलीला का आयोजन कभी बंद नहीं होने देंगे। ग्रामीणों के उसी सामूहिक संकल्प का परिणाम है कि यह परंपरा आज भी निरंतर आगे बढ़ रही है।
कलाकारों के लिए अभिनय नहीं, साधना है रामलीला
समिति अध्यक्ष मानसिंह के अनुसार, रामलीला कलाकारों के लिए केवल अभिनय या रंगमंच नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति समर्पण और आत्मिक साधना का माध्यम है। मंच पर उतरते ही कलाकार अपने पात्र में पूरी तरह रम जाते हैं और भगवान श्रीराम के आदर्शों को जीवंत करने का प्रयास करते हैं।
रामलीला में रावण की भूमिका निभाने वाले शुभम सिंह का कहना है कि लंकापति का किरदार निभाना उनके लिए किसी परीक्षा से कम नहीं है। पूरे 12 दिनों तक भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े प्रसंगों का मंचन किया जाता है।
ग्रामीणों में यह धार्मिक विश्वास भी प्रचलित है कि रामलीला में पात्र निभाने वाले कलाकार निरोग रहते हैं। गंभीरपुर की रामलीला आज केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गांव की एकजुटता, सांस्कृतिक विरासत और पीढ़ियों से चले आ रहे सामूहिक संकल्प का प्रतीक बन चुकी है।
