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प्रयागराज

इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अवैध हिरासत पर सख्त, दोषी अधिकारियों के वेतन से वसूला जाएगा मुआवजा

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‘शांति भंग’ की धाराओं के दुरुपयोग पर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी, नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बताया सर्वोपरि

8 दिन की अवैध हिरासत पर ₹2 लाख मुआवजा, संबंधित एसीपी के वेतन से होगी वसूली

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस कमिश्नरेट प्रणाली में “शांति भंग” की धाराओं के कथित दुरुपयोग को लेकर महत्वपूर्ण और सख्त फैसला सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान द्वारा संरक्षित अधिकार है और वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी व्यक्ति को जेल भेजना कानून के विरुद्ध है।

न्यायमूर्ति सिद्धार्थ एवं न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने हेबियस कॉर्पस रिट याचिका संख्या 317/2026, मंसूर अहमद उर्फ लल्लू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में सुनवाई करते हुए 8 दिन तक अवैध रूप से हिरासत में रखे गए व्यक्ति को ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि संबंधित दोषी अधिकारी, तत्कालीन सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) के वेतन से वसूल की जाए।

क्या था पूरा मामला?

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घर से उठाकर ले गई थी पुलिस, जेल भेजने की प्रक्रिया पर उठे सवाल

याचिकाकर्ता मंसूर अहमद का आरोप था कि 19 मार्च 2026 की रात पुलिस उन्हें उनके घर से उठाकर ले गई। पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 170, 126 और 135 के तहत कार्रवाई का हवाला दिया।

बाद में उन्हें सहायक पुलिस आयुक्त एवं विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट, बारा के समक्ष प्रस्तुत किया गया। आरोप था कि बिना पर्याप्त सुनवाई और वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए उन्हें एक मुद्रित आदेश के आधार पर जेल भेज दिया गया।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड में कहीं भी यह उल्लेख नहीं था कि याचिकाकर्ता ने व्यक्तिगत बांड भरने से इनकार किया था। इसके बावजूद उन्हें 27 मार्च 2026 तक जेल में रखा गया।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

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मजिस्ट्रेटी शक्तियों के दुरुपयोग पर जताई चिंता

खंडपीठ ने कहा कि पुलिस कमिश्नरों और उनके अधीन कार्यरत अधिकारियों को दी गई मजिस्ट्रेटी शक्तियों का कई मामलों में दुरुपयोग किया जा रहा है।

अदालत के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों में यह सामने आया कि प्रयागराज और गाजियाबाद सहित कई जिलों में बीएनएसएस की धारा 126, 135 और 170 के तहत हजारों लोगों को एक दिन से लेकर 20 दिनों तक जेल में रखा गया।

कोर्ट ने इसे “बेहद चिंताजनक स्थिति” बताते हुए कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ ऐसा व्यवहार स्वीकार्य नहीं है।

पूरे उत्तर प्रदेश के लिए जारी किए गए महत्वपूर्ण निर्देश

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जमानती की अनिवार्यता समाप्त

अब शांति भंग या प्रिवेंटिव डिटेंशन की कार्रवाई में केवल व्यक्तिगत बांड लिया जाएगा। इसकी अधिकतम राशि ₹20,000 निर्धारित की गई है। किसी बाहरी जमानती की आवश्यकता नहीं होगी।

बांड भरते ही मिलेगी रिहाई

यदि संबंधित व्यक्ति व्यक्तिगत बांड भर देता है, तो उसे तत्काल रिहा करना होगा।

इनकार का ऑडियो-वीडियो रिकॉर्ड अनिवार्य

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यदि कोई व्यक्ति बांड भरने से इनकार करता है, तो उसका लिखित रिकॉर्ड रखने के साथ ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग भी करनी होगी।

अवैध हिरासत पर प्रतिदिन मुआवजा

यदि किसी नागरिक को बिना वैध आधार के 24 घंटे से अधिक हिरासत में रखा जाता है, तो राज्य सरकार को ₹25,000 प्रतिदिन के हिसाब से मुआवजा देना होगा।

अधिकारियों के वेतन से होगी वसूली

मुआवजे की पूरी राशि संबंधित दोषी अधिकारी या मजिस्ट्रेट के वेतन से वसूल की जाएगी।

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विभागीय कार्रवाई भी होगी

दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जाएगी।

कानूनी विशेषज्ञों ने फैसले को बताया मील का पत्थर

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय उत्तर प्रदेश में “शांति भंग” संबंधी धाराओं के इस्तेमाल की प्रक्रिया में बड़ा बदलाव ला सकता है। इससे यह स्पष्ट संदेश गया है कि केवल आशंका के आधार पर किसी नागरिक की स्वतंत्रता को लंबे समय तक सीमित नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने पुलिस कमिश्नर, प्रयागराज को 14 सितंबर 2026 तक आदेश के अनुपालन की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश भी दिया है।

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इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता, पुलिस जवाबदेही और विधि के शासन को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। न्यायालय के इस निर्णय से भविष्य में अवैध हिरासत और शांति भंग की धाराओं के कथित दुरुपयोग पर प्रभावी अंकुश लगने की उम्मीद है।

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