वाराणसी
सोमनाथ धाम के अध्यात्म, संस्कृति और इतिहास पर हुआ राष्ट्रीय विमर्श
वाराणसी। राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, डी.एल.डब्ल्यू., वाराणसी के इतिहास विभाग की ओर से 9 मई 2026 को “सोमनाथ धाम की सनातन यात्रा: अध्यात्म, संस्कृति और इतिहास का संगम” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हाइब्रिड मोड में किया गया।
सोमनाथ धाम गौरव के 75वें वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित इस संगोष्ठी को उच्च शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश का प्रायोजन प्राप्त था। कार्यक्रम में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, शोध संस्थानों तथा अकादमिक जगत से जुड़े विद्वानों, शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने सहभागिता की।कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातः 10 बजे मंगलाचरण, दीप प्रज्ज्वलन एवं अतिथियों के स्वागत के साथ हुआ।
महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. (डॉ.) बृज किशोर त्रिपाठी ने स्वागत संबोधन में कहा कि सोमनाथ धाम भारत की आस्था, संस्कृति, इतिहास और राष्ट्रीय स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक है।निदेशक उच्च शिक्षा प्रोफेसर बीएल शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि सोमनाथ धाम भारतीय संस्कृति की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक है, जिसमें आस्था, इतिहास, संघर्ष और पुनर्निर्माण एक साथ दिखाई देते हैं।
उन्होंने कहा कि सोमनाथ का महत्व किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि यह पूरे भारत की सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा हुआ है। उन्होंने उच्च शिक्षा संस्थानों की भूमिका पर बल देते हुए कहा कि विद्यार्थियों में इतिहास-बोध, सांस्कृतिक आत्मगौरव और राष्ट्र के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण विकसित करना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि ऐसे अकादमिक आयोजन नई पीढ़ी को अपनी सभ्यतागत जड़ों से जोड़ते हैं और भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन विमर्श का हिस्सा बनाते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि सभ्यताएं केवल भौतिक संरचनाओं से नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक स्मृति, आस्था और पुनर्निर्माण की इच्छाशक्ति से जीवित रहती हैं। मुख्य वक्ता डॉ. प्रवेश भारद्वाज, प्रोफेसर, इतिहास विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने अपने व्याख्यान में सोमनाथ धाम को भारतीय सभ्यता की निरंतरता का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक शक्ति और आध्यात्मिक चेतना के केंद्र होते हैं।
उन्होंने सोमनाथ के विध्वंस और पुनर्निर्माण की ऐतिहासिक प्रक्रिया को भारत की संघर्षशील आत्मा और सांस्कृतिक धैर्य से जोड़ा।क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी प्रो. ज्ञान प्रकाश वर्मा ने कहा कि सोमनाथ धाम भारतीय संस्कृति, आस्था और राष्ट्रीय चेतना की अखंड परंपरा का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन विद्यार्थियों को भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और गौरवशाली अतीत से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बनते हैं।
विशिष्ट वक्ता प्रो. आनंद चौधरी, अध्यक्ष, इतिहास विभाग, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी ने सोमनाथ धाम को भारत की तीर्थ परंपरा, लोक-आस्था और सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण केंद्र बताया। सम्मानित अतिथि प्रो. जे.पी. लाल, कुलाधिपति, केंद्रीय विश्वविद्यालय झारखंड ने अपने संबोधन में सोमनाथ धाम को राष्ट्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक बताया।
उन्होंने कहा कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण स्वतंत्र भारत की सांस्कृतिक चेतना और आत्मविश्वास का ऐतिहासिक क्षण था।जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के डॉ. ब्रजेश कुमार तिवारी ने अपने वक्तव्य में सोमनाथ धाम के सांस्कृतिक और आर्थिक पक्षों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत के मंदिर स्थानीय अर्थव्यवस्था, पर्यटन, रोजगार, हस्तशिल्प, सेवा क्षेत्र और सांस्कृतिक उद्यमिता को भी नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। डॉ. सत्य नारायण, प्रोफेसर, इतिहास विभाग, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सेवापुरी, वाराणसी ने सोमनाथ धाम के ऐतिहासिक पक्ष पर अपने विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. रचना शर्मा ने किया।संगोष्ठी के दौरान प्रश्नोत्तर सत्र में प्रतिभागियों ने सक्रिय भागीदारी करते हुए सोमनाथ धाम के इतिहास, संस्कृति, स्थापत्य, पर्यटन और समकालीन प्रासंगिकता पर चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि सोमनाथ धाम भारत की उस सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है, जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद निरंतर जीवित रही है।
समापन सत्र में आयोजन सचिव डॉ. कमलेश कुमार तिवारी ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों, शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
