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वाराणसी

ट्रामा सेंटर में प्री-आपरेटिव रूम खत्म कर बनाए गए वार्ड, अव्यवस्थाओं पर उठे सवाल

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वाराणसी। आइएमएस बीएचयू (IMS BHU) के ट्रामा सेंटर में बलिया की बुजुर्ग महिला राधिका देवी की मृत्यु के बाद मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। एक ओर जांच में अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्थाओं में खामियां उजागर हो रही हैं, वहीं विभाग के चिकित्सकों ने इस घटना को ट्रामा सेंटर की ढांचागत अव्यवस्थाओं से जुड़ा बताया है। एक वरिष्ठ डॉक्टर के अनुसार, ट्रामा सेंटर की स्थापना के समय न्यूरो सर्जरी, प्लास्टिक सर्जरी और आर्थोपेडिक्स के लिए अलग-अलग प्री-आपरेटिव रूम की व्यवस्था थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में प्रशासनिक बदलाव के चलते इन्हें समाप्त कर उनकी जगह टेक केयर वार्ड और डीलक्स रूम बना दिए गए।

वर्तमान में पूरे ट्रामा सेंटर में केवल एक साझा प्री-आपरेटिव रूम ही बचा है, जिसे मरीजों की पहचान में हुई बड़ी चूक का प्रमुख कारण माना जा रहा है। राधिका देवी, जिन्हें न्यूरो सर्जरी के लिए भर्ती किया गया था, उन्हें कूल्हे के ऑपरेशन के लिए आर्थोपेडिक ऑपरेशन थिएटर में भेज दिया गया। अस्पताल प्रशासन ने नाम की समानता के कारण भ्रम की बात कही है, लेकिन दस्तावेजों के अनुसार मरीज का उपचार न्यूरो विभाग में होना था। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि विभाग और ऑपरेशन की प्रकृति अलग होने के बावजूद इतनी बड़ी गलती कैसे हुई।

इस बीच, घटना के करीब 15 दिन बाद मरीजों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए आर्म बैंड (पहचान पट्टी) को अनिवार्य कर दिया गया है। चिकित्सक लंबे समय से इस व्यवस्था की मांग कर रहे थे, लेकिन इसे नजरअंदाज किया जाता रहा। घटना के समय मरीज के पास आर्म बैंड नहीं था, जिससे पहचान का आधार केवल केस शीट और मौखिक जानकारी तक सीमित रह गया था। माना जा रहा है कि यदि यह व्यवस्था पहले लागू होती, तो ऐसी त्रुटि से बचा जा सकता था।

मामले में चिकित्सा दृष्टिकोण से भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं। जानकारी के अनुसार कूल्हे के ऑपरेशन के बाद मरीज 11 दिनों तक स्थिर रही थी और बाद में एनेस्थीसिया विभाग ने उसे न्यूरोसर्जरी के लिए फिट घोषित किया था। न्यूरोसर्जरी के सात दिन बाद आईसीयू में उसकी मृत्यु हो गई। ऐसे में यह भी प्रश्न उठ रहा है कि यदि सर्जरी में कोई गंभीर त्रुटि नहीं थी, तो प्री-एनेस्थीसिया चेकअप के दौरान मरीज की पहचान और बीमारी की पुष्टि दोबारा क्यों नहीं की गई।

आइएमएस निदेशक प्रो. एसएन संखवार ने स्वीकार किया कि ट्रामा सेंटर में विभागवार अलग-अलग प्री-आपरेटिव रूम होने चाहिए, ताकि ऐसी घटनाओं से बचा जा सके। उन्होंने कहा कि जांच में सामने आई खामियों को दूर करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। फिलहाल पीड़ित परिवार न्याय की मांग कर रहा है, जबकि संस्थान के भीतर से उठ रही आवाजें मौजूदा प्रबंधन और ढांचागत बदलावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। मामले में विस्तृत जांच रिपोर्ट आने के बाद ही जिम्मेदारी तय होने की संभावना है।

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