वाराणसी
शिवभक्तों ने मणिकर्णिका घाट पर मनाई मसान की होली, निर्माण कार्य और विरोध के बीच भी कायम रही परंपरा
वाराणसी (जयदेश)। मसान की होली को लेकर रोक और उठे विवादों के बीच शनिवार को मणिकर्णिका घाट स्थित बाबा मसान नाथ मंदिर में प्रातःकाल से ही पूजा-अर्चना प्रारंभ हो गई। नागा साधुओं और अन्य संतों ने मंदिर में एकत्र होकर बाबा को चिताभस्म अर्पित की और इसी के साथ मसान की होली की औपचारिक शुरुआत हुई। धीरे-धीरे श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती गई और दोपहर तक बड़ी संख्या में लोग मणिकर्णिका घाट पहुंच गए।

पुलिस प्रशासन ने गंगा घाट की ओर जाने वाली मणिकर्णिका घाट की गलियों को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित कर दिया था। केवल शव यात्रा में शामिल लोगों को ही आवागमन की अनुमति दी गई थी। इसके बावजूद वैकल्पिक मार्गों से कुछ लोग घाट तक पहुंचे और संतों के साथ आयोजन में शामिल हुए। सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर प्रत्येक मोड़ पर पुलिसकर्मी तैनात रहे। हालांकि रोक के संबंध में कोई औपचारिक आदेश सार्वजनिक नहीं किया गया, फिर भी प्रशासनिक स्तर पर घाट की ओर जाने पर नियंत्रण बना रहा।

मान्यता है कि रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन भगवान शिव अपने गणों के साथ मणिकर्णिका घाट पर भस्मी फाग खेलते हैं। काशी में जीवन और मृत्यु को समान भाव से स्वीकार करने की परंपरा रही है, जहां देवस्थान और महाश्मशान दोनों का महात्म्य समान माना जाता है। फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को देवों के देव महादेव के यहां आगमन की मान्यता है। मसान की होली में काशी सहित देश-विदेश से आए पर्यटक भी सहभागी बने। इस बार निर्माण कार्यों और विरोध के कारण भीड़ अपेक्षाकृत कम रही, फिर भी चिता भस्म से होली खेलने की परंपरा निभाई गई।

आयोजन की शास्त्रीयता को लेकर इस वर्ष विशेष विवाद सामने आया। डोमराजा विश्वनाथ चौधरी ने प्रशासन को विरोध स्वरूप ज्ञापन सौंपा, जबकि उनके परिवार के कुछ सदस्य आयोजन के समर्थन में दिखाई दिए। आयोजकों का कहना है कि रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन दोपहर में मणिकर्णिका के महाश्मशान में आयोजित भस्म होली इस सत्य का प्रतीक है कि मृत्यु को जानने और समझने के बाद भी उसे जीवन की तरह सहज स्वीकार करना ही शिवत्व है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, विवाह की बारात में अपने गणों से भयभीत ससुराल पक्ष के आग्रह पर भगवान शिव उन्हें गौने की बारात में साथ नहीं ले गए थे। इसी वेदना को शांत करने के लिए उन्होंने मणिकर्णिका पर अपने गणों को आमंत्रित कर उनके साथ चिता भस्म की होली खेली। मसाननाथ महादेव मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर द्वारा वर्ष 2009 में इस परंपरा को पुनः प्रारंभ किए जाने के बाद से इसकी पहचान व्यापक स्तर पर स्थापित हुई। इस वर्ष भी मसान की होली में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक शामिल हुए और इस अनूठी परंपरा के साक्षी बने।
