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गोरखपुर

करोड़ों की मशीन, ज़ंग खाता सिस्टम और मौन प्रशासन — यह विकास है या विडंबना?

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गोरखपुर।  जनपद के तारामंडल क्षेत्र में स्थित बाबा गंभीरनाथ प्रेक्षागृह परिसर में स्थापित दोपहिया वाहन पार्किंग लिफ्टिंग मशीन आज केवल लोहे का ढांचा बनकर रह गई है। करोड़ों रुपये की लागत से लगाई गई यह मशीन जिस उद्देश्य से लाई गई थी, वह उद्देश्य अब फाइलों और भाषणों तक ही सीमित होकर रह गया है। यह खबर सिर्फ एक खराब मशीन की नहीं, बल्कि उस सोच की है जो योजना बनाती है, पैसा खर्च करती है और फिर उसे भगवान भरोसे छोड़ देती है।

सरकार की मंशा स्पष्ट थी शहर में बढ़ते वाहनों के दबाव को देखते हुए आधुनिक तकनीक से पार्किंग की समस्या का समाधान किया जाए, जगह की बचत हो और दोपहिया वाहन सुरक्षित रहें। लेकिन सवाल यह है कि जब मशीन खुले आसमान के नीचे बारिश, धूप और नमी में सड़ने के लिए छोड़ दी जाए, तो क्या उसे विकास कहा जाएगा या लापरवाही?

आज हालत यह है कि मशीन मौजूद होते हुए भी वाहन सड़क पर खड़े हैं। यातायात बाधित हो रहा है, दुर्घटनाओं की आशंका बनी रहती है और आम नागरिक असुविधा झेल रहा है। वहीं दूसरी ओर, लाखों-करोड़ों की सरकारी संपत्ति धीरे-धीरे जंग खा रही है। यह दृश्य सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर जवाबदेही किसकी है? क्या केवल मशीन लगाना ही विकास की परिभाषा है, या उसका रखरखाव और संचालन भी उतना ही जरूरी है?

यदि भविष्य में इस क्षेत्र में और निर्माण हुआ, तो पार्किंग की समस्या और विकराल हो जाएगी। तब शायद फिर नई योजना बनेगी, नया बजट आएगा और एक और मशीन कहीं कोने में पड़ी जंग खाएगी। यह सिलसिला कब रुकेगा?

यहां जरूरत है केवल बयानबाजी की नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की। गोरखपुर विकास प्राधिकरण और संबंधित विभागों को चाहिए कि वे तुरंत इस मशीन को टीन शेड या उपयुक्त संरचना से ढकवाएं, उसकी तकनीकी जांच कराएं और इसे नियमित संचालन में लाएं। यह केवल एक मशीन को बचाने का प्रश्न नहीं है, बल्कि सरकारी धन, जनसुविधा और प्रशासनिक संवेदनशीलता की परीक्षा है। अगर आज भी आंखें मूंद ली गईं, तो कल यह मशीन नहीं, बल्कि जनता का भरोसा पूरी तरह जंग खा जाएगा। और तब सवाल केवल पार्किंग का नहीं, पूरे सिस्टम का होगा।

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