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गाजीपुर

डीसी मनरेगा पर ग्राम प्रधान, सचिव, एपीओ और बीडीओ को संरक्षण देने का आरोप, डीएम से शिकायत

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मनरेगा भ्रष्टाचार में जांच तीन बार टली, जिम्मेदारों पर कार्रवाई की मांग

गाजीपुर। करंडा विकास खंड अंतर्गत ग्राम सभा सुआपुर में मनरेगा घोटाले की शिकायत पर जांच को बार-बार टालना अब प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संरक्षण की साजिश मानी जा रही है। शिकायतकर्ता अमित उपाध्याय ने राज्य मनरेगा आयुक्त उत्तर प्रदेश समेत डीएम से शिकायत करते हुए डीसी मनरेगा विजय यादव पर ग्राम प्रधान, सचिव, एपीओ और बीडीओ करंडा को खुला संरक्षण देने का गंभीर आरोप लगाया है।

शिकायती पत्र में ग्राम सभा सुआपुर में मनरेगा कार्यों में फर्जी मस्टर रोल, फोटो से फोटो जोड़कर हाजिरी, एक ही फोटो को कई मस्टर रोलों में इस्तेमाल, कार्यस्थल पर वास्तविक कार्य से कम निष्पादन और सरकारी धन के खुले दुरुपयोग जैसे गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि शिकायत की जांच अब तक तीन बार (दिनांक 21 जनवरी 2026, 29 जनवरी 2026 और 19 फरवरी 2026) को टाल दी गई, लेकिन न तो आज तक स्थलीय सत्यापन हुआ और न ही कोई पारदर्शी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की गई।

शिकायतकर्ता ने शिक़ायती पत्र में उल्लेख करते हुए बताया कि लगातार जांच टालने से यह आशंका और गहरी हो गई है कि सबूत मिटाने का समय दिया जा रहा है, वित्तीय अभिलेखों में हेरफेर कराया जा रहा है और घोटाले के जिम्मेदारों को कानूनी कार्रवाई से बचाने की कोशिश हो रही है। शिकायतकर्ता ने राज्य मनरेगा आयुक्त उत्तर प्रदेश को शिकायती पत्र देते हुए मांग किया है कि उक्त जांच को विकास खंड करंडा, जिला स्तर से हटाकर मंडल/ राज्य स्तरीय स्वतंत्र टीम को सौंपी जाय।

उन्होंने मांग किया है कि 15 दिवस की समय- सीमा में अनिवार्य रूप से जांच पूर्ण कराई जाय। जांच लंबित रखने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी जांच कर विभागीय कार्रवाई की जाए। प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर ग्राम प्रधान एवं संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की जाए। जांच अवधि में संबंधित वित्तीय एवं अभिलेखीय दस्तावेजों को सुरक्षित रखने हेतु आदेश जारी किया जाए।

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शिकायतकर्ता ने शिकायती पत्र में निवेदन करते हुए कहा कि यदि 15 दिवस के भीतर निष्पक्ष जांच एवं ठोस कार्रवाई सुनिश्चित नहीं की जाती है तो बाध्य होकर मुख्यमंत्री, लोकायुक्त एवं माननीय उच्च न्यायालय की दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर होंगा। जिसकी जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों की होगी। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या मनरेगा में हुए इस कथित घोटाले की निष्पक्ष जांच होगी, या फिर फाइलों के नीचे दबाकर भ्रष्टाचार को हमेशा की तरह दफन कर दिया जाएगा?

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