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स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा शहीद झूरी सिंह का बलिदान

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भदोही। स्वाधीनता आंदोलन का इतिहास रणबांकुरों से भरा पड़ा है। देश को परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए लाखों लोगों ने प्राणों की आहुति दी। काशी-प्रयाग के मध्य गंगा की माटी में पले.बढ़े शहीद झूरी सिंह को याद करना जरूरी है। तत्कालीन जिला मिर्जापुर के भदोही में अंग्रेजों के खिलाफ शहीद झूरी सिंह के नेतृत्व में बगावत का बिगुल फूंका गया। झूरी सिंह का जन्म भदोही जनपद के परऊपुर गांव में 21 अक्तूबर 1816 में हुआ था। अंग्रेजों के खिलाफ 28 फरवरी को अभोली में सभा सिंह के बाग में मीटिंग आयोजित कि गयी थी जिसका मकसद था कि अंग्रेजों को नील की खेती से रोकना। बाद में खुद की सेना को संगठित कर अंग्रेजों के खजाने को लूट कर देश को गुलामी से मुक्त कराना था। अंग्रेजों के खिलाफ इस रणनीति में उदवंत सिंह, रामबक्श सिंह, भोला सिंह, रघुवीर सिंह, दिलीप सिंह, माताभक्त सिंह, सर्वजीत सिंह, राजकरण सिंह, संग्राम सिंह, महेश्वरी प्रसाद, बलभद्र सिंह, शिवदीन, रामटहल हनुमान जैसे युवा शामिल हुए। देश में 1857 की क्रांति भड़कने के बाद अंग्रेजों के खिलाफ गांव.गांव में आक्रोश फैलने लगा और आम जनता नील की खेती का विरोध करने लगी थी। यूरोपीयन इतिहासकार जक्शन ने लिखा है कि 10 जून 1857 को भदोही में क्रांति ने इतना व्यापक रूप ले लिया था कि अंग्रेज सिपाहियों को मिर्जापुर की पहाड़ी पर भागना पड़ा था। भंडा गांव में अंग्रेजों की ओर से नियुक्त सजावल को घायल कर दिया गया और जीटी रोड पर अवरोध उत्पन्न कर मालखाने को लूट लिया गया। इस सफलता के बाद संगठित सेना गठित कर उदवंत सिंह को राजा घोषित कर दिया गया। उदवंत सिंह की गतिविधियों की भनक जब अंग्रेजों को लगी खलबली मच गई जिसका नतीजा यह हुआ कि 16 जून को अंग्रेजों ने अपनी चाल बदलते हुए मिर्जापुर के ज्वाइंट मजिस्ट्रेट बिलियन रिचर्ड म्योर जो बंगाल सिविल सेवा का अधिकारी था उसकी नियुक्ति भदोही के पाली गोदाम पर कर दी गई जहां अंग्रेज नील की खेती कराते थे। इसके बाद अंग्रेज अफसर ने एक साजिश रची और क्रांति का नेतृत्व कर रहे उदवंत सिंह को निमंत्रण पत्र भेजकर बुलवाया। फिर उदवंत सिंह के साथ दो और क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर गोपीगंज के शाही मार्ग पर्र इमली के पेड़ में फांसी पर लटका दिया। फांसी की घटना के बाद भदोही की जनता का आक्रोश फूट पड़ा शहीद उदवंत सिंह की धर्मपत्नी रत्ना सिंह ने तलवार उठाकर मजिस्ट्रेट बिलियन रिचर्ड म्योर का वध करने का प्रण लिया। बाद में इस आंदोलन का नेतृत्व झूरी सिंह ने अपने हाथ में ले लिया जो मजिस्ट्रेट बिलियन रिचर्ड म्योर को जिंदा नहीं देखना चाहते थे। उन्होंने अपने क्रांतिकारी साथियों को लेकर पाली स्थित नील गोदाम पर आक्रमण किया हमले में तीन अंग्रेज अधिकारी और कुछ सिपाहियों की हत्या हुई। क्राउन बनाम झूरी सिंह की गवाही में बताया गया है कि लगभग 300 आजादी के दीवानों ने 04 जुलाई  को सायं 04 बजे पाली गोदाम पर आक्रमण किया था। आंदोलनकारियों के हमले से बचने के लिए पाली गोदाम से रिचर्ड म्योर जान बचा कर भागना चाहा तो वहां शीतल नामक गड़ेरिया भेड़ चरा रहा था। झूरी सिंह ने उसे ललकारा कि अंग्रेज भागने न पाए उसके पैर में लग्गा फसाओ, शीतल पाल ने वैसा ही किया और अंग्रेज अफसर गिर पड़ा। इसके बाद बिना देर किये झूरी सिंह दहाड़ते हुए उस पर टूट पड़े और तलवार से उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया। बाद में 16 साल का मुसई सिंह रिचर्ड म्योर का सिर हाथ में पकड़ कर झूरी सिंह के साथ उदवंत सिंह की पत्नी रत्ना सिंह के पास पहुंच कर सामने पटक दिया क्योंकि रत्ना सिंह ने कसम खाई थी कि जब तक उदवंत सिंह की हत्या का बदला उन्हें नहीं लिया जाता वह चैन से नहीं जी सकतीं। 05 जुलाई के दिन मुसई सिंह को काला पानी की सजा सुनाई गई अंडमान भेज दिया गया। पाली गोदाम पर आंदोलनकारियों के हमले और अंग्रेज अफसरों की हत्या के बाद हुकूमत की चूलें हिल गईं। अंग्रेज अफसर जार्ज वाकर के आदेश पर कर्नल सार्जेंट और तना नूर के नेतृत्व में एक टुकड़ी पाली गोदाम पहुंची जबकि कर्नल पीवाकर 05 जुलाई को ही पाली गोदाम पहुंच गया था जिसके बाद सेना के साथ क्रांतिकारियों की जमकर मुठभेड़ हुई। झूरी सिंह के गांव परऊपुर और सदौपुर में अंग्रेजों ने आग लगाकर झूरी सिंह पर 1000 साथियों पर 500 र्का इनाम घोषित किया । 12 जुलाई को भदोही के नए ज्वाइंट मजिस्ट्रेट माखनलाल को आदेश मिला कि झूरी सिंह के साथियों को शीघ्र गिरफ्तार किया जाए।  इतिहासकारों का कथन है कि झूरी सिंह को व्यापक जन समर्थन प्राप्त था सेना संगठित करने और हथियार खरीदने के लिए अभोलीए सुरियावां के कृपालपुर बिसौली और कारी गांव के लोगों ने आर्थिक मदद,छुपने को लिए शरण दी थी। झूरी सिंह को पकड़ने के लिए मेजर वारनेटए साइमन, पी वाकर, इलियट और हैंग जैसे अधिकारियों के नेतृत्व में टीम गठित हुई इसी बीच 24 अगस्त को मिर्जापुर में झूरी सिंह की मुलाकात जगदीशपुर आरा-बिहार, के क्रांतिकारी कुंवर सिंह से हो जाती है जिसका नतीजा यह हुआ कि क्रांति की आग दुद्धी.सिंगरौली एवं रोहतास-बिहार तक पहुंची और क्रांतिकारियों ने घोरावल थाने को लूटकर रापटगंज की तहसील में आग लगा दी। फिर आंदोलन की आग बढ़ती हुई रीवां मध्य प्रदेश तक पहुंची। अंग्रेजों की फौज झूरी सिंह को गिरफ्तार नहीं कर पा रही थी लेकिन झूरी सिंह के परिजनों पर अंग्रेजों का अत्याचार बढ़ता जा रहा था। झूरी सिंह छुपते.छुपाते नेपाल पहुंच गये बाद में पूर्वी चंपारण होते हुए आरा पहुंच रात्रि विश्राम किया। सुबह चंदौली के रास्ते वाराणसी पहुंचे कपसेठी के लोहराडीह खुरैइयां गांव में उनकी ससुराल थी ससुराल वालों ने इनके खिलाफ साजिश रच अंग्रेज सिपाहियों को सूचना दी। सिपाहियों ने उन्हें ससुराल से गिरफ्तार कर मिर्जापुर जेल में बंद किया और ओझला नाले पर फांसी दे दी।

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