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पूर्वांचल

गाजीपुर : कद्दावर प्रत्याशी की तलाश में बीजेपी

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गाजीपुर। पूर्वांचल के माफिया मुख़्तार अंसारी के इंतकाल के बाद पूर्वी उत्तरप्रदेश का गाजीपुर लोकसभा चुनाव अति महत्वपूर्ण हो गया है। खासतौर ‌पर अखिलेश यादव के गत दिनों के दौरे के बाद अखिलेश ने न सिर्फ़ अंसारी परिवार को सांत्वना दी बल्कि मुख़्तार के मौत की सुप्रीम कोर्ट के जज से जाँच की भी माँग की।

गाजीपुर लोक सभा सीट हमेशा से भाजपा को छकाती रही है। स्वतंत्रता आंदोलन में अपने अप्रतिम योगदान के लिए मशहूर इस ज़िले ने पिछले 13 लोकसभा चुनावों में सिर्फ़ तीन बार बीजेपी पर भरोसा जताया है। अन्यथा हर बार ग़ैर बीजेपी उम्मीदवारों ने ही यहाँ से विजय हासिल की। इसलिए इस बार बीजेपी क़द्दावर उम्मीदवार को उतार कर बाजी पलटने के मूड में है।

सपा ने अफज़ाल अंसारी को उम्मीदवार बना कर गेंद बीजेपी के पाले में डाल दिया है। सूत्रों के अनुसार, गाजीपुर से या तो मनोज सिन्हा को बीजेपी टिकट दे सकती है या फिर बृजेश सिंह के भतीजे सुशील सिंह पर बड़ा दांव खेल सकती है। 2019 का पिछला चुनाव बीएसपी के टिकट पर अफ़ज़ल अंसारी ने जीता था। उन्होंने बीजेपी के मनोज सिन्हा को 119392 मत के बड़े अंतर से हराया था। अफज़ाल अंसारी को 566082 मत तो मनोज सिन्हा को 446699 मत मिले थे। उस चुनाव में सुभासपा उम्मीदवार रामजी 33877 मत पाकर तीसरे स्थान पर रहे। चौथे स्थान पर कांग्रेस के अजीत कुशवाहा 19834 मत पाकर रहे।

2014 के चुनाव पर नज़र डालें तो पायेंगे कि बीजेपी के मनोज सिन्हा ने 306928 मत पाकर विजय हासिल की थी।ज्ञउन्होंने सपा की सुकन्या कुशवाहा (274477) को क़रीब 30 हज़ार के छोटे अंतर से हराया था। बीजेपी के लिये ख़तरे की घंटी उसी चुनाव में बज चुकी थी। परंतु मनोज सिन्हा और बीजेपी को जनपद में किए विकास कार्यों पर इतना भरोसा था की उन्होंने जाति फैक्टर पर ध्यान ही नहीं दिया। परिणामस्वरूप बीजेपी और मनोज सिन्हा को करारी हार का सामना करना पड़ा। यह हार इसलिए भी सालने वाली थी कि पड़ोस के वाराणसी संसदीय सीट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उम्मीदवार थे और ऐसा माना जा रहा था कि आसपास की सभी सीटें बीजेपी की झोली में जायेंगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

इसलिए इस बार बीजेपी गाजीपुर से ऐसे मज़बूत उम्मीदवार की तलाश में है जो इस संसदीय सीट के जटिल जातीय समीकरण को भेद सके। तमाम नाम सामने आ रहे हैं लेकिन कोई फाइनल नहीं हो पा रहा है। २०२४ में चुनावी परिदृश्य बदल चुका है। एक तरफ़ सपा और कांग्रेस का इंडी गठबंधन है तो दूसरी तरफ़ छोटे बड़े दलों का एनडीए गठबंधन है जिसमें ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा भी शामिल है। तेरह चुनावों में सिर्फ़ तीन बार जीत सकी बीजेपी बीजेपी 2024 के चुनाव में प्रदेश की सभी 80 सीटों पर विजय का दावा ज़रूर कर रही है जबकि ग़ाज़ीपुर के आँकड़े इसकी गवाही नहीं दे रहे।

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आँकड़ों पर नज़र डालें तो पायेंगे कि सन् 1971 से 2019 तक हुए 13 लोकसभा चुनावों में सिर्फ़ तीन बार बीजेपी इस सीट पर विजय हासिल कर सकी। 1996,1999 और 2014 में मनोज सिन्हा ने यहाँ से जीत हासिल की। अन्यथा १९७१ में सरयू पांडेय सीपीआई,१९७७ में गौरी शंकर राय भारतीय लोक दल,ज़ैनुल बशर कांग्रेस १९८०,पुनः १९८४ में कांग्रेस से ही जैनुल बशर,१९८९ में कांग्रेस से ही जगदीश,१९९१ में सीपीआई से विश्वनाथ शास्त्री ,१९९८ में सपा से ओमप्रकाश सिंह ,२००४ में सपा से अफ़ज़ल अंसारी ,२००९ में सपा से राधेमोहन सिंह और २०१९ में बसपा से अफ़ज़ल अंसारी चुनाव जीते।

अब सारी निगाहें बीजेपी और बीएसपी के संभावित उम्मीदवारों पर टिकी हैं। जानकारों का मानना है कि बसपा उम्मीदवार बीजेपी और सपा उम्मीदवार की जीत हार में अंतर पैदा कर सकता है।

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