गोरखपुर
ई-रिक्शा की रफ्तार में पीछे छूटती रिक्शा चालकों की जिंदगी
गोरखपुर। शहर की गलियों में कभी पैडल रिक्शों की घंटियों की आवाज आम हुआ करती थी, लेकिन बदलते समय के साथ यह आवाज अब धीरे-धीरे सुनाई दे रही है। आधुनिक जीवन की तेज रफ्तार और यात्रियों की बदलती जरूरतों के बीच ई-रिक्शा ने परिवहन को आसान और तेज बनाया है, लेकिन इसका असर पारंपरिक रिक्शा चालकों की रोजी-रोटी पर भी दिखाई देने लगा है।
कभी पैडल रिक्शा चालक अपने पैरों की ताकत से यात्रियों को गंतव्य तक पहुंचाते थे। सुबह सूरज निकलने से पहले ही वे रिक्शा लेकर सड़क किनारे सवारी की तलाश में खड़े हो जाते थे। अब सामने से एक के बाद एक ई-रिक्शा गुजरते हैं और कम समय तथा अपेक्षाकृत कम किराये के कारण यात्री उनकी ओर आकर्षित होते हैं। ऐसे में पैडल रिक्शा चालकों को कई घंटे सवारी के इंतजार में बिताने पड़ते हैं।
एक बुजुर्ग रिक्शा चालक के अनुसार, पहले दिनभर में कई चक्कर मिल जाते थे, लेकिन अब कई घंटे इंतजार के बाद भी पर्याप्त सवारी नहीं मिलती। कम होती आमदनी के बीच महंगाई, बच्चों की पढ़ाई, मकान का किराया, भोजन और इलाज का खर्च इन परिवारों की मुश्किलें बढ़ा रहा है।
हालांकि ई-रिक्शा ने यात्रियों को तेज और सुविधाजनक परिवहन का विकल्प दिया है। इसलिए तकनीकी बदलाव को केवल रोजगार छिनने के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। असली चुनौती यह है कि परिवहन व्यवस्था में बदलाव के साथ पारंपरिक रिक्शा चालकों के लिए वैकल्पिक रोजगार, प्रशिक्षण और सामाजिक सुरक्षा के अवसर कितने उपलब्ध कराए जाते हैं।
शहर का विकास केवल तेज वाहनों और आधुनिक परिवहन से नहीं मापा जा सकता। विकास की सार्थकता इस बात से भी जुड़ी है कि बदलाव के दौर में कमजोर वर्ग के लोगों की आजीविका कितनी सुरक्षित रहती है। सड़क किनारे खड़ा पुराना पैडल रिक्शा आज भी यही सवाल खड़ा करता है कि विकास की रफ्तार में उन हाथों के लिए कितनी जगह बची है, जिन्होंने वर्षों तक शहर को अपनी मेहनत से चलाया है।
