चन्दौली
श्रीराम कथा के दूसरे दिन धर्म, संस्कार और परोपकार का संदेश
कथावाचिका राघव प्रिया ओझा बोलीं—दूसरों का उपकार करना सबसे बड़ा धर्म, माता-पिता का सम्मान और परिवार में प्रेम बनाए रखना जरूरी
नौगढ़ (चंदौली)। दुर्गा मंदिर परिसर में आयोजित श्रीराम कथा के दूसरे दिन कथावाचिका राघव प्रिया ओझा ने श्रद्धालुओं को धर्म, संस्कार, सेवा, परोपकार और सदाचार का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य के मुख की सार्थकता तभी है, जब उससे प्रभु का भजन किया जाए। हाथ दान और धर्म के कार्यों के लिए हैं। दूसरों का उपकार करने से बड़ा कोई धर्म नहीं है। जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को सत्कर्म करते हुए इसे सार्थक बनाना चाहिए।
कथावाचिका ने कहा कि साधु-संतों की सेवा, दान और परोपकार भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण मूल्य हैं। श्रद्धालुओं से धर्म के मार्ग पर चलने और जरूरतमंदों की सहायता करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में भी मनुष्य को धैर्य नहीं खोना चाहिए और गलत कार्यों से दूर रहना चाहिए।
परिवार में प्रेम और संस्कार जरूरी
राघव प्रिया ओझा ने दांपत्य जीवन में प्रेम, सम्मान और जिम्मेदारी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पति-पत्नी को विवाह के समय लिए गए सात वचनों का जीवनभर पालन करना चाहिए। उन्होंने माता-पिता से बच्चों को संस्कारित और धैर्यवान बनाने की अपील की। कहा कि बच्चों को विपरीत परिस्थितियों में घबराने के बजाय धैर्य से काम लेना सिखाना चाहिए, ताकि वे कुसंगति से बच सकें।
रामकथा से मिलती है सदाचार की प्रेरणा
कथावाचिका ने तीर्थराज प्रयागराज, त्रिवेणी संगम और ऋषि-महात्माओं की तपस्या का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि रामचंद्र जी की कथा मनुष्य को सदाचार और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। संकट के समय ईश्वर का स्मरण करते हुए सत्य और धर्म का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।
उन्होंने भगवान शिव की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि सनातन परंपरा में भोलेनाथ का विशेष स्थान है। ईश्वर की कृपा मनुष्य के जीवन को संतोष और शांति प्रदान करती है। कथा के दौरान कुंभज ऋषि, याज्ञवल्क्य ऋषि, सीता हरण, दंडक वन और भगवान राम की नरलीला के प्रसंग भी सुनाए गए।
माता-पिता के सम्मान का दिया संदेश
कथावाचिका ने माता जगदंबिका को महिषासुरमर्दिनी बताते हुए शक्ति और धर्म की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने सती प्रसंग के माध्यम से श्रद्धालुओं को माता-पिता का सम्मान करने, परिवार में आपसी प्रेम बनाए रखने और संस्कारों को जीवन में अपनाने की सीख दी। माता की ममता और त्याग का भावपूर्ण वर्णन सुनकर श्रद्धालु भक्तिभाव में डूब गए। कथा के दौरान माता रानी के भजन से मंदिर परिसर भक्तिमय हो उठा।
