भदोही
रोग-शोक का नाश करती हैं मां कूष्मांडा, विधि-विधान से हुई पूजा-अर्चना
नवरात्र के चौथे दिन श्रद्धालुओं ने की आराधना, सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना
ज्ञानपुर। शारदीय नवरात्र के चौथे दिन बुधवार को मां दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप मां कूष्मांडा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। श्रद्धालुओं ने माता रानी के चरणों में शीश नवाकर सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और परिवार की खुशहाली की कामना की। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कूष्मांडा की आराधना से भक्तों के रोग-शोक दूर होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
मंद मुस्कान से की ब्रह्मांड की रचना
मां कूष्मांडा के धार्मिक महत्व के बारे में बताते हुए विनय कुमार मिश्र ने कहा कि मान्यता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था और चारों ओर अंधकार छाया हुआ था, तब देवी ने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। इसी कारण उन्हें मां कूष्मांडा कहा जाता है। उन्हें सृष्टि की आदिस्वरूपा और आदिशक्ति भी माना जाता है।
उन्होंने बताया कि मां कूष्मांडा की आठ भुजाएं हैं, इसलिए उन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। उनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृत से भरा कलश, चक्र और गदा सुशोभित हैं। आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को प्रदान करने वाली जपमाला रहती है। उनका वाहन सिंह है।
सूर्य के समान तेजस्वी हैं मां कूष्मांडा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कूष्मांडा का निवास सूर्यमंडल के भीतर माना जाता है। उनके शरीर की कांति और प्रभा सूर्य के समान तेजस्वी है। कहा जाता है कि उनके तेज से दसों दिशाएं प्रकाशित होती हैं और समस्त सृष्टि में उनकी ऊर्जा व्याप्त है।
पूजा से सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना
विनय कुमार मिश्र ने बताया कि नवरात्र में भक्तों को स्वच्छ और पवित्र मन से मां दुर्गा की आराधना करनी चाहिए। धार्मिक मान्यता है कि मां कूष्मांडा की विधि-विधान से पूजा करने पर भक्तों को आयु, यश, बल और आरोग्य की प्राप्ति होती है। देवी अपने भक्तों को कष्टों से मुक्ति देकर सुख-समृद्धि और उन्नति का आशीर्वाद प्रदान करती हैं। इसलिए नवरात्र के दौरान मां कूष्मांडा की उपासना का विशेष महत्व माना जाता है।
