गोरखपुर
नवरात्र विशेष: बारानगर की बीरकालिका माता के दरबार में पूरी होती हैं भक्तों की मुरादें
सरयू तट पर स्थित प्राचीन देवी स्थान बना आस्था का केंद्र, नवरात्र और रविवार को उमड़ती है श्रद्धालुओं की भारी भीड़
राहुल दुबे | गोला बाजार (गोरखपुर), 11 अक्टूबर। जनपद के दक्षिणांचल में गोला तहसील क्षेत्र के बारानगर गांव में स्थित मां बीरकालिका का दरबार श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि सच्चे मन और श्रद्धा के साथ मां के दरबार में आने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यही वजह है कि नवरात्र के दिनों में ही नहीं, बल्कि वर्षभर यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। मंदिर परिसर में घंटा-घड़ियाल की ध्वनि और माता के जयकारों से वातावरण भक्तिमय बना रहता है।
सरयू नदी के तट पर स्थित है प्राचीन देवी स्थान
गोला ब्लॉक की ग्रामसभा बारानगर तहसील मुख्यालय से लगभग 12 किलोमीटर पश्चिम-दक्षिण दिशा में सरयू नदी के तट पर स्थित है। नदी के उत्तरी तट पर मां कालिका का प्राचीन स्थान है। यह मंदिर क्षेत्र के साथ-साथ आसपास के जनपदों के श्रद्धालुओं के लिए भी आस्था का केंद्र बना हुआ है। माता की उत्पत्ति को लेकर क्षेत्र में कई मान्यताएं प्रचलित हैं।
नाविकों को नदी में मिला था पिंड, स्वप्न के बाद हुई स्थापना
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, पुराने समय में सरयू नदी गांव से काफी दूर बहती थी। गांव के मल्लाह नाव के जरिए लोगों को नदी पार कराते थे। बताया जाता है कि एक दिन नाविकों को नदी की सतह पर एक पिंड बहता हुआ दिखाई दिया। वे उसे उठाकर गांव ले आए और स्थापित कर दिया। इसके बाद नाव से नदी पार कराने में परेशानी होने लगी।
कहा जाता है कि गांव के शिवमंगल मल्लाह को एक रात स्वप्न में माता ने दूसरे स्थान पर स्थापित करने का संकेत दिया। सुबह उन्होंने परिवार के लोगों को इसकी जानकारी दी। इसके बाद मल्लाह समुदाय के लोगों ने पिंड को गांव के बाहर घने जंगल में स्थापित कर दिया। स्थानीय मान्यता है कि स्थापना के बाद सरयू नदी मंदिर के समीप से बहने लगी और नाविकों की परेशानी दूर हो गई।
फलाहारी बाबा ने तपस्या कर विकसित किया स्थान
किंवदंती के अनुसार, उस समय मंदिर के आसपास घना जंगल था। इसी दौरान फलाहारी संत बाबा बोधीदास यहां पहुंचे और माता के स्थान पर तपस्या करने लगे। अपनी साधना और प्रयासों से उन्होंने इस स्थान को विकसित किया। उन्होंने यहां हनुमान मंदिर और धर्मशाला का निर्माण कराया। उनके निधन के बाद तपस्थली पर समाधि बनाई गई। वर्तमान में यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ-साथ रमणीय स्थल के रूप में भी पहचान बना चुका है।
नवरात्र और रविवार को उमड़ते हैं श्रद्धालु
मां बीरकालिका के दरबार में नवरात्र और प्रत्येक रविवार को विशेष भीड़ रहती है। आसपास के गांवों के अलावा दूसरे जिलों से भी श्रद्धालु वाहनों से दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। यहां मुंडन, कथा और कड़ाही सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए जाते हैं। मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु दोबारा पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिर की साफ-सफाई और देखरेख की जिम्मेदारी मुख्य रूप से मल्लाह समुदाय के सेवक संभालते हैं।
नवरात्र में सुरक्षा व्यवस्था की मांग
नवरात्र और रविवार को श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए ग्रामीणों ने सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि भीड़ के दौरान स्थानीय प्रशासन की ओर से पर्याप्त पुलिस बल की तैनाती नहीं की जाती। ग्रामीणों के अनुसार, इस संबंध में कई बार प्रशासन को सूचना दी गई है। उनका आग्रह है कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा और भीड़ के सुचारु प्रबंधन के लिए विशेष इंतजाम किए जाएं।
समाजसेवियों के सहयोग से मंदिर और धर्मशाला का भी निर्माण कराया गया है। सरयू नदी के तट पर स्थित मां बीरकालिका का यह दरबार आज भी क्षेत्र की धार्मिक परंपरा, लोकमान्यता और जनआस्था का महत्वपूर्ण प्रतीक बना हुआ है।
