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वाराणसी

चक्रपुष्करिणी कुंड में अजय राय ने लगाई डुबकी, मां मणिकर्णिका का दर्शन-पूजन कर की लोक कल्याण की कामना

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अनादिकाल से काशी में अक्षय तृतीया के अगले दिन चक्रपुष्करिणी कुंड में श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाकर पुण्यफल प्राप्त करते हैं। वर्ष में केवल इसी एक दिन इस कुंड में स्नान करने की परंपरा चली आ रही है। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी शनिवार 11 मई को प्रदेश अध्यक्ष व वाराणसी लोकसभा क्षेत्र से इंडिया गठबन्धन के प्रत्याशी अजय राय स्नान कर मां मणिकर्णिका का दर्शन-पूजन किया और लोककल्याण की कामना किया।

मान्यता है कि भगवान शंकर जी ने काशी बसाने के बाद महादेव ने देवी पार्वती के स्नान के लिए इस कुंड को अपने सुदर्शन चक्र से स्थापित किया था। स्नान के दौरान मां पार्वती का कर्ण कुंडल कुंड में गिरने से नाम मणिकर्णिका पड़ा। मणिकर्णी माई की अष्टधातु की प्रतिमा प्राचीन समय में इसी कुंड से निकली थी। मां मणिकर्णिका सब पर सहाई हों।

स्नान व दर्शन-पूजन करने के पश्चात प्रदेश अध्यक्ष प्रत्याशी वाराणसी लोकसभा क्षेत्र श्री अजय राय ने कहा कि, हम काशी की परम्परा से जुड़े है आस्था से जुड़े है।आज संस्कृति व आस्था के लिए काशी में सबसे बड़ा दिन है। यह स्नान पर्व इस स्नान पर्व का महत्व काशीवासी व आस्थावान लोग ही समझ सकते है।

अजय राय ने आगे कहा कि, हम प्रत्येक वर्ष स्नान व दर्शन – पूजन करते है। यहां की मान्यता है कि कुंड में स्नान से अक्षय फल, चारों धाम के पुण्य का लाभ मिलता है। अक्षय तृतीया के अगले दिन मणिकर्णिका घाट स्थित चक्र पुष्करणीय कुंड में स्नान-दान के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। काशी खंड के अनुसार माँ गंगा अवतरण से पहले इसका अस्तित्व है। भगवान विष्णु ने भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए यहां हजारों वर्ष तपस्या की थी। भोलेनाथ और देवी पार्वती के स्नान के लिए उन्होंने कुंड को अपने सुदर्शन चक्र से स्थापित किया। स्नान के दौरान मां पार्वती का कर्ण कुंडल कुंड में गिरने से नाम मणिकर्णिका पड़ा।

अक्षय तृतीय के अगले दिन स्नान दर्शन पूजन का अधिक महत्व है। पुरातत्व, पौराणिक कथाओं, भूगोल, संस्कृति अध्यात्म, कला , वाराणसी का इतिहास , उत्तरवाहिनी गंगा पर अपनी अनूठी स्थिति, भारत के इतिहास के माध्यम से इसकी यात्रा, भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी यह नगरी आदि विशेषताएँ इसे सबसे पुराना जीवित शहर का महत्व प्रदान करता है।

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हम सबका सौभाग्य है की हम काशीवासी है व काशी के लोगो के सेवक की भूमिका में कार्य करते है और काशी की प्राचीनता को सँवारने की व बचाने की लड़ाई इस समय सबसे बड़ी लड़ाई है क्योंकि पिछले 10 वर्षों में काशी से काशी की प्राचीनता ,भगैलिकता ,पौराणिकता,बनारसीपन छीन लिया गया है। काशी में पुनः काशी की पहचान को संजोय रखने के लिए इस बार बनारस की जनता बनारसीपन को बचाने के लिए तैयार है इस बार निश्चित परिवर्तन होगा।

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