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सियासत

जिले की हर वर्ग की नेता बन चुकी हैं पूर्व केंद्रीय मंत्री व सांसद सुल्तानपुर मेनका संजय गांधी, फिर ऐसा क्यूँ ? एक बड़ा सवाल

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सुल्तानपुर। बीजेपी शीर्ष नेतृत्व “पूर्व केंद्रीय मंत्री व सुल्तानपुर सांसद मेनका संजय गांधी” के नाम पर टिकट के लिए जिस तरह से मनन,मंथन किया जा रहा है,उस पर एक सवालिया प्रश्न, जिस तरह से अभी तक दो सूचियां आ चुकी और अब तक राष्ट्रीय स्तर की नेता के नाम पर मुहर नहीं लगाया गया। इसकी वजह जो भी हो लेकिन सुल्तानपुर की जनता ने अपना सांसद और नेता मेनका संजय गांधी को मान रखा है। क्योंकि अक्सर मंच से मेनका संजय गांधी ये कहती रही हैं कि हमने जाति-धर्म और बिरादरी नहीं देखी। हमने ये नहीं सवाल किया कि वोट किया था या नहीं। जो आया हमने उसकी मदद की।

आज इसका इफेक्ट देखने को मिल रहा है,भाजपा के वोटरों के अलावा एक वर्ग विशेष के वोटर मेनका गांधी को सांसद के रूप में चुनने के लिए व्याकुल हैं। देर है तो टिकट के रूप में हरी झंडी की। हां यदि अंतिम समय में उनके टिकट के साथ राजनीतिकरण हुआ और फिर किसी और जतन से वे चुनावी मैदान में आ गई तो एक दशक की जीत का चला आ रहा सपना चकनाचूर होकर रह जाएगा,और कहीं पहले आप पहले आप मे गाड़ी ना छूट जाए क्योंकि अब तक के समीकरण यही बता रहे हैं।

बताते चलें कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को इस बार तो सुलतानपुर लोकसभा की सीट पर मंथन ही नहीं करना चाहिए था,पहली ही लिस्ट में सुलतानपुर से सांसद व पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका संजय गांधी के नाम की घोषणा हो जानी चाहिऐ थी। फिलहाल शीर्ष के लोग और उनकी शीर्ष पर पहुंच चुकी बुद्धि में क्या गुणा गणित चल रहा है ये मैं नहीं जनता लेकिन एक जिम्मेदार अधिवक्ता, जिम्मेदार पत्रकार, जिम्मेदार नागरिक एवं एक वोटर होने के नाते मैं सिर्फ इतना ही कहूंगा कि पीलीभीत से बुलाकर जिसको आपने सुलतानपुर की कमान सौंपी थी। उसने अब जिलेवासियों के दिल में जगह बना ली है।

तो वहीं बाकी भाजपा के शीर्ष की मर्जी जो चाहे जिसको चाहे टिकट दें। परंतु टिकट देते वक्त इतना जरूर सोचे कि कहीं आपने उनको नहीं चुना जिसको सुलतानपुर की जनता चुनना चाहती है तो क्या होगा,क्या भाजपा का अबकी बार 400 पार का लक्ष्य पूरा  होगा,क्या पार्टी के अंदर ही कोई ऐसा है जो पार्टी को खोखला करना चाहता है,क्या बार-बार जीती हुई सीट पर भी इतना गहन मंथन,मनन होता है,क्या पार्टी अभी तक प्रभु श्री राम के पुत्र के द्वारा बसाई गयी कुशभवनपुर की नगरी की भावनाओं को समझ नहीं पाई है,क्या इन सब पहलुओं पर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को सोचने की आवयश्कता नहीं है,भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से ये एक बड़ा सवाल !

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