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वाराणसी

बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में स्थित है इकलौता भारत माता का मंदिर, दूर – दूर से दर्शन को आते है लोग

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वाराणसी। धार्मिक एवं सांस्कृतिक नगरी वाराणसी में स्थित अपने ढंग का अनोखा एकमात्र भारतमाता मंदिर है। इस मंदिर की आराध्य भारत माता हैं। यहां पर पूजा, कर्मकाण्ड या दूसरे मंदिरों जैसे घंटा घड़ियाल नहीं बजते और न ही पंडितों पुरोहितों की खींचतान होती है। आजादी की लड़ाई के दौर में अपने प्राणों की आहुति देने वालों का प्रेरणा स्रोत यह मंदिर आज भी हिन्दू, मुस्लिम, सिख एवं ईसाई जैसे जाति या साम्प्रदायिक और उन्मादी धार्मिक भावना से कोसों दूर सर्वधर्म समभाव का संदेश दे रहा है।

मंदिर का उद्घाटन 25 अक्टूबर 1931 को महात्मा गांधी ने किया था। मंदिर के 75 वर्ष पूरे हो गए हैं लेकिन इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। मंदिर के उद्घाटन के अवसर पर महात्मा गांधी ने कहा था कि इस मंदिर में किसी देवता या देवी की मूर्ति नहीं है, यहां संगमरमर पर उभरा हुआ भारत का एक मानचित्र भर है।

काशी विद्यापीठ एवं देश के सबसे पुराने हिन्दी अखबार ‘आज’ के संस्थापक शिव प्रसाद गुप्त को इस मंदिर को बनवाने की प्रेरणा मुम्बई से पुणे जाते समय हुई थी। वह वहां विधवाश्रम देखने गए। आश्रम में जमीन पर भारत माता का एक मानचित्र बना था। उन्हें यह मंदिर अच्छा लगा। वाराणसी लौटने के बाद भारत मंदिर बनाने की योजना अपने गुरुजनों एवं सहयोगियों से मिलकर बना डाली। भारत माता मंदिर का शिलान्यास समाजवादी भगवान दास ने दो अप्रैल 1926 को किया था।’काशी विद्यापीठ’, वर्तमान में ‘महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ’ के परिसर में दुनिया के इस अनोखे मंदिर का निर्माण हुआ है।

इसका उद्घाटन करने के बाद महात्मा गांधी ने अपने सम्बोधन में कहा था कि- “इस मंदिर में किसी देवी-देवता की मूर्ति नहीं है। मुझे आशा है कि यह मंदिर सभी धर्मों,सभी जातियों के लोगों के लिये एक सार्वदेशिक मंच का रूप ग्रहण कर लेगा और इस देश में पारस्परिक धार्मिक एकता, शांति तथा प्रेम की भावना को बढ़ाने में योगदान देगा।

इस भूमि की पूर्व से पश्चिम तक लम्बाई 32 फुट दो इंच और उत्तर से दक्षिण तक 30 फुट दो इंच है। इसमें 762 चौकोर एक इंच वर्ग के मकराना के श्वेत पत्थर काटकर लगे हैं। इसमें हिमालय पर्वत की चोटियां एवं समुद्र दिखाया गया है। भारत भूमि के उत्तर में तिब्बत, तुर्किस्तान, पूर्व में ब्रह्मा मलम एवं चीन की दीवार का थोड़ा अंश दिखाया गया है। दक्षिण में बंगाल की खाड़ी एवं अन्य दिखाया गया है। भारत भूमि की समुद्र तल से उंचाई और गहराई आदि के मद्देनज़र संगमरमर बहुत ही सावधानी से तराशे गये हैं। मानचित्र को मापने के लिये धरातल का मान एक इंच बराबर 6.4 मील जबकि ऊंचाई एक इंच में दो हज़ार फ़ीट दिखायी गयी है। एवरेस्ट की ऊंचाई दिखाने के लिये पौने 15 इंच ऊंचा संगमरमर का एक टुकड़ा लगाया गया है। मानचित्र में हिमालय समेत 450 चोटियां, 800 छोटी व बड़ी नदियां उकेरी गयी हैं। बडे़ शहर सुप्रसिद्ध तीर्थ स्थल भी भौगोलिक स्थिति के मुताबिक दर्शाये गये हैं।

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बाबू शिवप्रसाद गुप्त ने इस मानचित्र को ही जननी जन्मभूमि के रूप में प्रतिष्ठा दी। मंदिर की दीवार पर बंकिमचंद्र चटर्जी की कविता ‘वन्दे मातरम’ और उद्घाटन के समय सभा स्थल पर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा लिखी गयी कविता ‘भारत माता का यह मंदिर’ समता का संवाद है।

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