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वाराणसी

किसानों की उत्पादन लागत घटाने पर फोकस, कृषि विभाग ने बढ़ाया जागरूकता अभियान

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वाराणसी। संयुक्त कृषि निदेशक, वाराणसी मण्डल की अध्यक्षता में शनिवार को कृषि रक्षा कार्यक्रमों के अन्तर्गत नवीन तकनीकी जागरूकता हेतु एक दिवसीय प्रशिक्षण का आयोजन संयुक्त कृषि निदेशक कार्यालय के सभागार कक्ष में किया गया। प्रशिक्षण में कृषि विज्ञान केन्द्र कल्लीपुर वाराणसी के वैज्ञानिक डॉ. मनीष पाण्डेय, उप कृषि निदेशक (शोध) वाराणसी, जिला कृषि रक्षा अधिकारी चन्दौली स्नेह प्रभा, उ0सं0कृषि0प्रसार अधिकारी वाराणसी निरूपमा सिंह, उर्वरक विश्लेषक राजकुमार सहित वाराणसी, चन्दौली, गाजीपुर एवं जौनपुर जनपदों के कृषि रक्षा अनुभाग के कार्मिक सम्मिलित रहे।

कार्यक्रम के दौरान जिला कृषि रक्षा अधिकारी चन्दौली स्नेह प्रभा ने बताया कि चन्दौली जनपद में जलस्तर अधिक होने से खेतों में नमी बनी रहती है, जिसके कारण धान में कंडुवा रोग बड़े पैमाने पर फैलता है तथा दीमक की समस्या भी सामने आती है। इन समस्याओं से बचाव के लिए बीज शोधन, भूमि शोधन और दीमक नियंत्रण हेतु व्यूवेरिया वैसियाना का गोबर के साथ उपयोग प्रभावी रहेगा। इस तकनीक का अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार कृषकों के बीच किया जाना आवश्यक है।

कृषि विज्ञान केन्द्र कल्लीपुर वाराणसी के डॉ. मनीष पाण्डेय ने बताया कि कृषि रक्षा रसायनों का अत्यधिक प्रयोग न केवल मानव शरीर बल्कि वातावरण के लिए भी हानिकारक है तथा इससे खेती की लागत में भी बढ़ोत्तरी हो जाती है। लगातार एक ही फसल उगाने से विशेष कीट व बीमारियाँ पनपती हैं, इसलिए फसल चक्र अपनाकर इनके जीवन चक्र को तोड़ा जा सकता है। उन्होंने गर्मियों में खेत की गहरी जुताई, मृदा संरक्षण, ढैंचा एवं नीम जैसी फसलों की हरी खाद के रूप में बुवाई के बाद जुताई करने तथा ट्राइकोडर्मा एवं व्यूवेरिया वैसियाना के उपयोग के प्रति किसानों को जागरूक करने पर जोर दिया। पत्तागोभी की बुवाई में प्रत्येक 16 पंक्तियों के बाद एक पंक्ति सरसों या गेंदा लगाने और एकीकृत कीट प्रबंधन के तहत रसायनों के प्रयोग में कमी लाने हेतु फेरोमोन ट्रैप व जैविक नियंत्रण उपायों को बढ़ावा देने की सलाह दी।

उप कृषि निदेशक (शोध) वाराणसी ने बताया कि कृषक अत्यधिक मात्रा में कृषि रक्षा रसायन एवं उर्वरकों का प्रयोग कर रहे हैं, जिससे मृदा स्वास्थ्य एवं वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और कई प्रकार की बीमारियाँ फैलने का खतरा बढ़ रहा है। साथ ही किसानों की लागत भी अधिक हो जाती है। इस स्थिति में जैविक खेती, जैव/बायो कल्चर, नेपेड, वर्मी कम्पोस्ट तथा ढैंचा को हरी खाद के रूप में अपनाने और ढैंचा बीज उत्पादन को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।

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अंत में संयुक्त कृषि निदेशक वाराणसी मण्डल, वाराणसी ने उपस्थित सभी अधिकारियों एवं कर्मचारियों से अपेक्षा की कि वे अपने कार्यों के प्रति सजग रहते हुए प्रशिक्षण में बताई गई नवीन तकनीकों को किसानों के बीच प्रभावी रूप से लागू कराएं, ताकि किसानों की लागत कम हो सके, मृदा स्वास्थ्य और पर्यावरण सुरक्षित रहे तथा मानव जीवन पर कोई दुष्प्रभाव न पड़े।

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