गाजीपुर
बनवासी समाज की पत्तल परंपरा विलुप्ति की कगार पर
प्लास्टिक और बफे सिस्टम से खत्म हो रही सदियों पुरानी परंपरा
बहरियाबाद (गाजीपुर) जयदेश। भारतीय संस्कृति में प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने की परंपरा सदियों पुरानी है। इस परंपरा का एक बेहद खूबसूरत और पर्यावरण-अनुकूल हिस्सा है पत्तल (पेड़ के पत्तों से बनी थाली)। विशेष रूप से बनवासी (आदिवासी) समाज के पास पत्तों को जोड़कर सुंदर पत्तल और दोने बनाने का एक अद्भुत हुनर रहा है। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में यह हुनर और परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गई है।
पत्तल का इतिहास भारत में वैदिक काल से जुड़ा हुआ है। हमारे पूर्वजों ने प्लास्टिक या काँच के बजाय प्रकृति से मिलने वाली चीज़ों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाया था। भारतीय परंपरा में पत्तल को सबसे शुद्ध माना गया है। मिट्टी या धातु के बर्तनों को दोबारा इस्तेमाल करने के लिए धोना पड़ता है, लेकिन पत्तल एक बार उपयोग के बाद सीधे प्रकृति में वापस मिल जाते हैं, जिससे वे हमेशा ‘जूठे’ के दोष से मुक्त माने जाते हैं।
पत्तल पर गर्म खाना परोसने से पत्तों में मौजूद पोषक तत्व और औषधीय गुण भोजन में मिल जाते हैं। पलाश के पत्तों पर खाने से पेट की बीमारियाँ दूर होती हैं और केले के पत्ते पर खाने से शरीर को एंटीऑक्सीडेंट्स मिलते हैं। इतिहास में कचरा प्रबंधन की यह सबसे बेहतरीन मिसाल थी। खाना खाने के बाद पत्तल को फेंक दिया जाता था, जिसे या तो मवेशी खा लेते थे या वे सड़कर खाद बन जाते थे।
बनवासी समाज का जीवन पूरी तरह जंगलों और प्रकृति पर निर्भर रहा है। पत्तल बनाना केवल उनका काम नहीं, बल्कि एक कला है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी ट्रांसफर होती आई है। पत्तों को आपस में जोड़ने के लिए किसी धागे या गोंद का इस्तेमाल नहीं होता। बनवासी लोग बाँस की पतली-पतली तीलियों (जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘खिला’ या ‘सींक’ कहा जाता है) का उपयोग करके पत्तों को बहुत ही खूबसूरती और मजबूती से आपस में सिलते हैं। वे न केवल समतल पत्तल बनाते हैं, बल्कि गहरे ‘दोने’ (कटोरी) भी इतनी कुशलता से बनाते हैं कि उनमें से दाल या रसदार सब्ज़ी भी नीचे नहीं टपकती।
एक समय था, जब गाँवों और कस्बों में शादियों की शान पत्तल हुआ करते थे। इसके बिना कोई भी मांगलिक कार्य पूरा नहीं माना जाता था। शादी से कुछ दिन पहले ही गाँव के लोग और बनवासी समाज के कारीगर मिलकर पत्तल बनाना या इकट्ठा करना शुरू कर देते थे। यह आपसी भाईचारे और सहयोग का प्रतीक था। पत्तल की सबसे बड़ी खूबसूरती यह थी कि शादी में अमीर हो या गरीब, राजा हो या रंक, सब एक पंगत (लाइन) में ज़मीन पर बैठकर एक जैसे पत्तल में खाना खाते थे। यह समाज में समानता को बढ़ावा देता था। शादियों में भारी मात्रा में पत्तलों की मांग होने से बनवासी और ग्रामीण समाज के लोगों को रोज़गार मिलता था। यह उनकी जीविका का एक बड़ा साधन था।
आज बनवासी समाज का यह हुनर और पत्तल की परंपरा तेज़ी से गायब हो रही है। बाज़ार में मिलने वाली प्लास्टिक, थर्माकोल और केमिकल से बनी डिस्पोजेबल प्लेट्स ने पत्तलों की जगह ले ली है। ये सस्ती और दिखने में आधुनिक लगती हैं, लेकिन स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक हैं। अब शादियों में ‘बफे सिस्टम’ (खड़े होकर खाना) का चलन बढ़ गया है, जिसके कारण पारंपरिक पंगत और पत्तल गायब हो गए हैं।
बनवासी समाज द्वारा बनाई जाने वाली पत्तल केवल एक थाली नहीं, बल्कि हमारी पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली का प्रतीक है। आज जब पूरी दुनिया प्लास्टिक प्रदूषण से परेशान है, तब हमें अपनी इस पुरानी और वैज्ञानिक परंपरा की ओर वापस लौटने की सख्त ज़रूरत है। शादियों और त्योहारों में पत्तल का दोबारा उपयोग शुरू करके हम न केवल पर्यावरण को बचा सकते हैं, बल्कि बनवासी समाज के इस बेहतरीन हुनर और रोज़गार को भी ज़िंदा रख सकते हैं।
