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वाराणसी

शिक्षा के महत्व को समझें ना की शिक्षा को व्यापार का जरिया समझे- दिलीप श्रीवास्तव

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रिपोर्ट – प्रदीप कुमार

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वाराणसी। नया सत्र शुरू होते ही अभिभावकों की परेशानी बढ़ जाती है, 1 से 2 माह की फीस के साथ स्कूलों में डेवलपमेंट फीस के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती है तो कॉपी किताब भी खरीदना है वही हर साल किताबों के सिलेबस बदल देना जिससे अभिभावकों के साथ बच्चे भी परेशान होते हैं क्योंकि हर वर्ष मंहगी किताबें खरीद कर अपने बच्चों को पढ़ाना और फिर अगले वर्ष उन किताबों के सिलेबस बदल जाने से वह किताबें रद्दी हो जाती हैं जो किसी काम की नहीं जबकि पहले की जो शिक्षा नीति होती थी वह अब नहीं है पहले की अपेक्षा अब की शिक्षा नीति आधुनिक हो चुकी है सरकार को पुस्तकों के सिलेबस बदलने के नियम में बदलाव करना चाहिए क्योंकि हर वर्ष सिलेबस बदलने से बच्चों के मस्तिष्क का विकास नहीं होता है वह और कमजोर हो जाते हैं और मध्यमवर्ग भी परेशान होता है जिससे वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दे पाते हैं।
इस प्रकरण पर जब हमारे संवाददाता ने एक विद्यालय के प्रबंधक से वार्ता की तो उन्होंने बताया कि आज के समय में बड़े-बड़े स्कूल शिक्षा को अपना व्यवसाय बना चुके हैं मैं खुद अध्यापक हूं और स्कूलों की लूट को समझता हूं कुछ विद्यालय तो ऐसे हैं जो पुस्तक की दुकानों से संपर्क करते हैं कि किस पुस्तक पर कितना कमीशन हमारा बनता है क्योंकि निजी प्रशासकों की किताबें एनसीईआरटी की किताबों से 5 गुना महंगी होती है लेकिन हमारे विद्यालय में विगत 5 वर्ष से ऊपर हो गए अभी तक किसी भी किताब का सिलेबस नहीं बदला गया है क्योंकि मैंने विद्यालय की मान्यता क्षेत्र के अशिक्षित एवं गरीब व असहाय बच्चों को शिक्षित करने के उद्देश्य से ली थी और मैं सरकार से एक मांग भी करता हूं की किताबों के संशोधन करने की एक समय सीमा तय की जाए जिससे अभिभावकों को परेशानी ना हो।

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