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गाजीपुर

उज्ज्वला योजना के बावजूद गैस किल्लत, नई बहुएं सीख रहीं पारंपरिक खाना बनाना

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बहरियाबाद (गाजीपुर) जयदेश। बहरियाबाद एवं आस -पास के बाजारों के साथ-साथ ग्रामीण गांवो में रसोई गैस के न मिलने से महिलाओं में जबरदस्त गुस्सा व्याप्त है। नई नवेली बहू जो लकड़ियों से खाना कभी नहीं बनाई है, भारत सरकार द्वारा ग्रामीण महिलाओं के लिए उज्ज्वला योजनाओ से नई नवेली बहू परेशान होकर अब लकड़ी पर खाना बनाने का गुण सीख रही है। रसोई गैस के न मिलने से अब लोगों को सदियों पुरानी परंपरा के साथ खाना बनाने के महत्व को समझना जरूरी है।

ग्रामीण क्षेत्रों में रसोई गैस की कमी या कीमतों में बढ़ोत्तरी होने पर आज भी एक बड़ा वर्ग पारंपरिक संसाधनों की ओर रुख करता है। जब गैस उपलब्ध नहीं होती, तो मिट्टी के चूल्हे और लकड़ी का सहारा लेना मजबूरी और परंपरा दोनों बन गया है। ग्रामीण अंचलो के लोगों का मानना है कि लकड़ी की धीमी आंच पर बना खाना अधिक स्वादिष्ट होता है।

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मिट्टी के बर्तन और लकड़ी की आग खाने में एक विशिष्ट ‘स्मोकी’ फ्लेवर (सौंधापन) पैदा करती है। धीमी आंच पर खाना पकने से उसके पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं, विशेषकर दाल और पारंपरिक रोटियां। लकड़ी पर बना खाना स्वाद में बेहतर लग सकता है, लेकिन गैस की कमी ग्रामीण महिलाओं के श्रम और स्वास्थ्य पर अतिरिक्त बोझ डालती है। उज्ज्वला जैसी योजनाओं का उद्देश्य इसी समस्या को दूर करना है ताकि धुआं-मुक्त रसोई सुनिश्चित हो सके।

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