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सुपर अल नीनो ने बढ़ाई टेंशन, देश में भीषण गर्मी और सूखे का खतरा बढ़ा

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नई दिल्ली। देशभर में इस वर्ष भीषण गर्मी को लेकर पहले से ही चिंता जताई जा रही है। मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक इस बार सामान्य अल नीनो नहीं, बल्कि ‘सुपर अल नीनो’ बनने की आशंका है। यदि ऐसा होता है तो हीटवेव, अत्यधिक तापमान और कमजोर मानसून के मामले में कई पुराने रिकॉर्ड टूट सकते हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि अल नीनो क्या होता है और इसका भारत की गर्मी व बारिश पर किस तरह असर पड़ता है।

‘अल नीनो’ स्पेनिश भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ ‘छोटा बच्चा’ या ‘बालक’ होता है। यह नाम मौसम में आने वाले एक बड़े बदलाव को दिया गया है, जो हर कुछ वर्षों में प्रशांत महासागर में देखने को मिलता है। दक्षिण अमेरिका के कई देशों में पहले स्पेन का शासन रहा, इसलिए इस मौसमी बदलाव को स्पेनिश नाम दिया गया।

अल नीनो (Super El Niño) की शुरुआत दक्षिण अमेरिका के पास प्रशांत महासागर से होती है, लेकिन इसका असर हजारों किलोमीटर दूर भारत तक महसूस किया जाता है। सामान्य स्थिति में दक्षिण अमेरिका के पास समुद्र का पानी ठंडा रहता है, जबकि इंडोनेशिया और फिलीपींस की दिशा में पानी अपेक्षाकृत ज्यादा गर्म होता है। इस दौरान पूर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली ट्रेड विंड्स गर्म पानी को एशिया की तरफ धकेलती रहती हैं। इससे दक्षिण अमेरिका के पास ठंडा पानी ऊपर आता रहता है और एशिया की तरफ गर्म पानी जमा होता रहता है।

हर 2 से 7 वर्षों के बीच कभी-कभी ये ट्रेड विंड्स कमजोर पड़ जाती हैं। इसके बाद प्रशांत महासागर का गर्म पानी दोबारा दक्षिण अमेरिका की ओर लौटने लगता है। ऐसी स्थिति में महासागर का तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है, जिसे अल नीनो कहा जाता है। समुद्र का तापमान बढ़ने से दक्षिण अमेरिका की ओर ज्यादा बादल बनते हैं और भारी बारिश होती है, जबकि एशियाई क्षेत्रों में बादलों की संख्या कम हो जाती है।

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भारत में मानसून मुख्य रूप से अरब सागर और हिंद महासागर से आने वाली नम हवाओं पर निर्भर करता है। लेकिन अल नीनो के दौरान हवाओं का पैटर्न बदल जाता है। भारत की ओर नमी लाने वाली हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या दिशा बदल लेती हैं। इसके कारण बादल कम बनते हैं और वर्षा घट जाती है। अप्रैल, मई और जून के दौरान आसमान साफ रहने से सूर्य की किरणें सीधे जमीन पर पड़ती हैं, जिससे धरती तेजी से गर्म होती है। इसका सबसे अधिक असर उत्तर भारत, मध्य भारत, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे इलाकों में देखने को मिलता है।

साल 2023 में भी मजबूत अल नीनो के प्रभाव के चलते देश के कई शहरों में तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। उस समय मानसून कमजोर रहा, बारिश कम हुई और लंबे समय तक गर्मी बनी रही।

विशेषज्ञों के अनुसार इस बार अल नीनो ज्यादा खतरनाक रूप ले सकता है, जिसे ‘सुपर अल नीनो’ कहा जाता है। जब मध्य प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है, तब उसे सुपर अल नीनो माना जाता है। फिलहाल मध्य प्रशांत महासागर का तापमान लगभग +0.9 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है और समुद्र के भीतर बड़ी मात्रा में गर्म पानी जमा हो रहा है।

साल 1950 के बाद सुपर अल नीनो जैसी स्थिति बहुत कम बार दर्ज की गई है। वर्ष 1982, 1997 और 2015 में इसका प्रभाव देखने को मिला था। इस बार वैज्ञानिक इसलिए अधिक चिंतित हैं क्योंकि प्रशांत महासागर का पानी तेजी से गर्म हो रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण पृथ्वी पहले से ही गर्म हो रही है। ऐसे में यदि सुपर अल नीनो की स्थिति बनती है तो उसका असर और ज्यादा गंभीर हो सकता है। समुद्र के भीतर जमा गर्म पानी वातावरण को और अधिक गर्म कर रहा है।

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यदि इस वर्ष सुपर अल नीनो बनता है तो भारत में मानसून कमजोर पड़ सकता है। इसके चलते कई क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। वहीं हीटवेव लंबे समय तक चलने और ज्यादा खतरनाक होने की आशंका है। उत्तर भारत, मध्य भारत और पश्चिम भारत पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात बने रहे तो इस बार गर्मी कई पुराने रिकॉर्ड तोड़ सकती है और धरती भट्टी जैसी महसूस हो सकती है।

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