Connect with us

वाराणसी

शिक्षा संस्थानों को नफरत और विभाजन की राजनीति से दूर रखा जाए : अजय राय

Published

on

Loading...
Loading...

वाराणसी। प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने कहा कि हर जाति का सम्मान, सामाजिक समरसता हमारी पहचान शिक्षा संस्थानों को नफरत और विभाजन की राजनीति से दूर रखा जाए।काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जैसे देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में एमए इतिहास की परीक्षा में “ब्राह्मणवादी पितृसत्ता” जैसे शब्दों को जिस प्रकार प्रश्न के रूप में प्रस्तुत किया गया है, उसने पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है। शिक्षा का उद्देश्य किसी जाति, वर्ग या समुदाय के प्रति दुर्भावना पैदा करना नहीं, बल्कि समाज को ज्ञान, संवेदनशीलता और एकता की दिशा देना होता है।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज शिक्षा संस्थानों में आरएसएस की विचारधाराएं थोपी जा रही हैं जो समाज में वैचारिक टकराव और जातीय विभाजन को बढ़ावा देती हैं।भारत की सनातन परंपरा में ब्राह्मण समाज सदैव ज्ञान, तप, शिक्षा, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक रहा है। वेदों, उपनिषदों, भारतीय दर्शन, संस्कृत साहित्य और शिक्षा व्यवस्था को आगे बढ़ाने में ब्राह्मण समाज का ऐतिहासिक योगदान रहा है। ब्राह्मण समाज सदैव पूजनीय था, है और रहेगा। किसी भी जाति को अपमानित करने या उसे संदेह के घेरे में खड़ा करने की मानसिकता भारतीय संस्कृति और संविधान दोनों के विरुद्ध है।आज लगातार देखा जा रहा है कि शिक्षण संस्थानों में आरएसएस की वैचारिक दखल बढ़ती जा रही है। विश्वविद्यालय, कॉलेज और भर्ती परीक्षाओं तक में ऐसे प्रश्न और विषय शामिल किए जा रहे हैं जो समाज के भीतर जातीय तनाव और विरोधाभास पैदा करें।

पहले उत्तर प्रदेश की दरोगा भर्ती परीक्षा में ब्राह्मण समाज को “अवसरवादी” बताने वाला प्रश्न पूछा गया, जिस पर भारी विवाद हुआ। उसके बाद “घूसखोर पंडित” नामक फिल्म के जरिए भी एक पूरे वर्ग को अपमानित करने का प्रयास किया गया, जिसका व्यापक विरोध हुआ और अंततः फिल्म निर्माताओं को माफी मांगते हुए शीर्षक वापस लेना पड़ा। अब बीएचयू में इस प्रकार के प्रश्न यह दर्शाते हैं कि शिक्षा व्यवस्था को एक विशेष आरएसएस के वैचारिक एजेंडे के तहत प्रभावित किया जा रहा है।

भाजपा और आरएसएस देश की शिक्षा व्यवस्था को स्वतंत्र चिंतन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से दूर ले जाकर वैचारिक नियंत्रण का माध्यम बनाना चाहते हैं। इतिहास और समाजशास्त्र जैसे विषयों को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा रहा है कि युवाओं के मन में समाज के अलग वर्गों के प्रति अविश्वास और वैमनस्य पैदा हो। यह अत्यंत खतरनाक प्रवृत्ति है विश्वविद्यालयों का काम समाज को जोड़ना है, तोड़ना नहीं। शिक्षा संस्थानों को लोकतांत्रिक बहस, संविधान, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता का केंद्र होना चाहिए, न कि राजनीतिक प्रयोगशाला।

इतिहास को तथ्यों, प्रमाणों और संतुलित दृष्टिकोण के आधार पर पढ़ाया जाना चाहिए, न कि किसी संगठन विशेष की विचारधारा के अनुरूप। शिक्षा व्यवस्था में लगातार हो रहा वैचारिक हस्तक्षेप देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और स्वतंत्र अकादमिक वातावरण पर आघात है कांग्रेस पार्टी स्पष्ट रूप से मानती है कि देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब, सामाजिक समरसता और सभी वर्गों के सम्मान की रक्षा सबसे ऊपर है। किसी भी जाति, धर्म या समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने वाली सोच को स्वीकार नहीं किया जा सकता। भारत विविधताओं का देश है और यही विविधता उसकी सबसे बड़ी ताकत है। यदि शिक्षा संस्थानों में युवाओं को जातीय संघर्ष और वैचारिक नफरत की दिशा में धकेला जाएगा तो यह देश के भविष्य के लिए गंभीर खतरा होगा।

Advertisement

हम मांग करते हैं कि शिक्षा संस्थानों को भाजपा के राजनीतिक और आरएसएस के हस्तक्षेप से मुक्त रखा जाए। पाठ्यक्रम और परीक्षाओं में ऐसे विवादित और समाज को बांटने वाले विषयों को शामिल करने से बचा जाए। देश के युवाओं को नफरत नहीं, ज्ञान, विज्ञान, रोजगार और राष्ट्र निर्माण की दिशा दी जानी चाहिए। कांग्रेस पार्टी संविधान, सामाजिक सौहार्द और हर वर्ग के सम्मान की रक्षा के लिए सदैव संघर्ष करती रहेगी।

हम इस प्रश्न और ऐसी मानसिकता का पुरजोर विरोध करते है तथा विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग करते है कि इस प्रश्न को तत्काल वापस लिया जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में शिक्षा संस्थानों का उपयोग किसी राजनीतिक या वैचारिक एजेंडे के लिए न हो।

Copyright © 2024 Jaidesh News. Created By Hoodaa

You cannot copy content of this page