वाराणसी
लंपी से 323 गोवंश संक्रमित, टीकाकरण में लापरवाही पर अधिकारियों-कर्मचारियों पर होगी कार्रवाई
वाराणसी। जिले में लंपी वायरस का असर लगातार बढ़ता जा रहा है। शनिवार को पांच और गोवंश इसके संक्रमण से ग्रसित पाए गए। अब तक जिले में कुल 323 गोवंश लंपी से प्रभावित हो चुके हैं।
मुख्य विकास अधिकारी ने शनिवार को लंपी की रोकथाम को लेकर वर्चुअल समीक्षा बैठक की। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि जिन गांवों में लंपी से ग्रसित गोवंश पाए जा रहे हैं, उनके आसपास के गांवों में प्राथमिकता के आधार पर टीकाकरण किया जाए।

सीडीओ ने बीडीओ को ग्राम प्रधानों से संपर्क करने के निर्देश दिए। साथ ही प्रत्येक ग्राम पंचायत में एंबुलेंस का नंबर लिखवाने के आदेश दिए गए, ताकि आपात स्थिति में त्वरित कार्रवाई हो सके।
अपर मुख्य पशु चिकित्साधिकारी को निर्देश दिया गया कि वे टीकाकरण की कार्य योजना तैयार करें और रोस्टर के आधार पर डॉक्टरों की तैनाती करें, जिससे शत-प्रतिशत टीकाकरण सुनिश्चित हो सके। सीडीओ ने यह भी स्पष्ट किया कि लापरवाही बरतने पर संबंधित अधिकारी और कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

क्या है लंपी वायरस ?
लंपी वायरस (lumpy skin), असल में एक स्किन से जुड़ी वायरल बीमारी है जो कि मूल रूप से मवेशियों को प्रभावित करती है। ये खून पीने वाले कीड़ों से फैलती है, जैसे मक्खियों, मच्छरों की कुछ प्रजातियां और टिक। इससे जानवरों को बुखार होता है, त्वचा पर गांठें पड़ जाती हैं और मृत्यु भी हो सकती है।
लंपी वायरस जिसे लंपी स्किन डिजीज वायरस (lumpy skin disease virus) भी कहा जाता है, ये असल में एक प्रकार का पॉक्सवायरस (poxviruses) है। इसकी वजह से पशु बुरी तरह से संक्रमित होते हैं और इसकी शुरुआत पशुओं के बाल से होती है जिसमें टिक बैठे रहते हैं। इसके बाद बुखार होता है। पशुओं में दूध का उत्पादन कम हो जाता है और त्वचा पर गांठें निकल आती हैं।

इसके अलावा इसमें पशुओं को मास्टिटिस की समस्या भी होती है जिसमें कि लिम्फ नोड्स की सूजन हो जाती है। पशुओं का नाक बहने लगता है, आंखों से पानी भी आने लगता है। साथ ही साथ भूख भी नहीं लगती। इसके अलावा संक्रमित गायों और बैलों में लंबे समय तक बांझपन की समस्या भी देखी जाती है।
लंपी वायरस को फैलने से कैसे रोका जा सकता है-
लंपी वायरस को फैलने से रोकने का एक तरीका ये है कि आपको इन तमाम लक्षणों को देखते ही अपने पशुओं की टेस्टिंग करवानी चाहिए। इसके अलावा आपको अपने संक्रमित मवेशियों से दूसरे मवेशियों अलग कर लेना चाहिए। साथ ही इस बीमारी की रोकथाम के लिए इन टिप्स की मदद लेनी चाहिए। जैसे कि टीकाकरण, दवाएं और अन्य प्रबंधन रणनीतियां। इसके अलावा लोगों को संबंधित अधिकारियों और पशु चिकित्सकों से सलाह लेती रहनी चाहिए। साथ ही आपको अपने दूसरे पशुओं पर सख्त नजर रखना चाहिए और इस दौरान इन पशुओं के दूध के सेवन से बचना चाहिए।
