वाराणसी
‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ शब्द पर गरमाई सियासत, कांग्रेस ने उठाए सवाल
वाराणसी। बीएचयू (BHU) जैसे देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में एमए इतिहास के प्रश्नपत्र में जिस प्रकार का विवादित प्रश्न पूछा गया है, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है। शिक्षा संस्थानों का कार्य समाज को जोड़ना, जागरूक करना और तथ्यपरक इतिहास प्रस्तुत करना होता है, लेकिन आज लगातार पाठ्यक्रमों और इतिहास लेखन में वैचारिक हस्तक्षेप बढ़ता दिखाई दे रहा है।
2014 के बाद देश की शिक्षा व्यवस्था में आरएसएस की विचारधारा से प्रेरित लोगों का प्रभाव लगातार बढ़ा है इतिहास को निष्पक्ष रूप से प्रस्तुत करने के बजाय उसे राजनीतिक और वैचारिक दृष्टिकोण से गढ़ने का प्रयास किया जा रहा है। नई पीढ़ी को तथ्यों के स्थान पर विभाजनकारी सोच परोसी जा रही है, जो देश की अकादमिक परंपरा और सामाजिक सौहार्द दोनों के लिए खतरनाक है।
‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ जैसे शब्दों को जिस प्रकार प्रश्नपत्रों में शामिल किया जा रहा है, उससे समाज के एक वर्ग विशेष के प्रति नकारात्मक सोच उत्पन्न करने का प्रयास दिखाई देता है। विश्वविद्यालयों को वैचारिक प्रयोगशाला बनाना और छात्रों के मन में भ्रम एवं वैमनस्य पैदा करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।
इतिहास को तथ्यों, प्रमाणों और संतुलित दृष्टिकोण के आधार पर पढ़ाया जाना चाहिए, न कि किसी संगठन विशेष की विचारधारा के अनुरूप। शिक्षा व्यवस्था में लगातार हो रहा वैचारिक हस्तक्षेप देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और स्वतंत्र अकादमिक वातावरण पर आघात है।
मैं इस प्रश्न और ऐसी मानसिकता का पुरजोर विरोध करता हूँ तथा विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग करता हूँ कि इस प्रश्न को तत्काल वापस लिया जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में शिक्षा संस्थानों का उपयोग किसी राजनीतिक या वैचारिक एजेंडे के लिए न हो।”
