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फागुन की मिठास से दूर होता आज का युवा वर्ग

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संतकबीर नगर। भारतीय संस्कृति में लोकगीतों का विशेष महत्व रहा है। हमारे त्योहार, ऋतुएँ और पारंपरिक आयोजन लोकसंगीत की मधुर धुनों से जीवंत हो उठते थे। खासकर फागुन का महीना आते ही गाँव-गाँव में उल्लास का वातावरण बन जाता था। चौपालों पर, आँगनों में और मंदिर प्रांगण में मंडलियाँ सजती थीं और लोग मिलकर फाग गाते थे। ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम की ताल पर गूंजते फाग गीत सामाजिक एकता और भाईचारे का प्रतीक होते थे।

फाग केवल गीत नहीं था, बल्कि आपसी मेल-जोल और भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम भी था। इसमें प्रेम, भक्ति, हास्य और जीवन के विविध रंग समाहित होते थे। बुजुर्गों से लेकर युवाओं तक सभी इसमें उत्साह से भाग लेते थे। यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का सशक्त साधन थी।

लेकिन बदलते समय के साथ आज का युवा वर्ग इन लोकपरंपराओं से दूर होता जा रहा है। आधुनिक तकनीक, मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और पाश्चात्य संगीत के प्रभाव ने पारंपरिक लोकगीतों की जगह ले ली है। अब फागुन में चौपालों की जगह डिजिटल प्लेटफॉर्म ने ले ली है। परिणामस्वरूप सामूहिक गायन और सांस्कृतिक मेलजोल की वह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती दिखाई दे रही है।

यदि हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखना है, तो युवाओं को लोकगीतों के महत्व से अवगत कराना होगा। विद्यालयों और सामाजिक आयोजनों में लोकसंगीत प्रतियोगिताएँ आयोजित की जानी चाहिए। परिवारों को भी बच्चों को पारंपरिक गीतों और त्योहारों से जोड़ने का प्रयास करना चाहिए।

लोकगीत हमारी पहचान हैं, हमारी जड़ों की धरोहर हैं। यदि आज का युवा इन्हें अपनाए और आगे बढ़ाए, तो हमारी सांस्कृतिक परंपरा सदैव जीवंत और समृद्ध बनी रहेगी।

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