वाराणसी
बीएचयू का शोध: बकरी का दूध भविष्य का ‘सुपरफूड’, कैंसररोधी गुणों का दावा
वाराणसी। बढ़ती आबादी और पोषण संबंधी चुनौतियों के बीच काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के डेरी विज्ञान एवं खाद्य प्रौद्योगिकी विभाग के वैज्ञानिकों ने बकरी के दूध को भविष्य का ‘सुपरफूड’ करार दिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बकरी का दूध गाय के दूध का पौष्टिक विकल्प होने के साथ-साथ कैंसररोधी और सूजन कम करने वाले औषधीय गुणों से भी युक्त है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, गाय के दूध की तुलना में बकरी का दूध पचाने में अधिक आसान होता है, जिससे यह शिशुओं के लिए मां के दूध के समान गुणकारी माना जा रहा है। वहीं, जिन लोगों को गाय के दूध से एलर्जी की समस्या रहती है, उनके लिए भी बकरी का दूध एक सुरक्षित विकल्प के रूप में सामने आया है।
विज्ञानियों ने बकरी के दूध की तुलना मानव दूध और गाय के दूध से करते हुए इसके पोषण तत्वों का उल्लेख किया है। शोध में बताया गया कि इसमें कैल्शियम लगभग 120 मिलीग्राम प्रति 10 मिलीग्राम (उच्च मात्रा), लैक्टोज 4.11 प्रतिशत (गाय के दूध से कम, जिससे लैक्टोज इनटोलरेंस में राहत मिलती है), प्रोटीन 3.48 प्रतिशत (उच्च गुणवत्ता वाला) तथा मीडियम-चेन फैटी एसिड की अधिकता पाई गई है, जो शरीर को तुरंत ऊर्जा उपलब्ध कराते हैं।
बकरी के दूध की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक केवल पारंपरिक उबालने की विधि तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नान-थर्मल (बिना गर्मी वाली) आधुनिक तकनीकों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इन तकनीकों के माध्यम से पोषण नष्ट किए बिना बैक्टीरिया को खत्म करने, दूध की शुद्धता और बनावट सुधारने, सुरक्षा और ताजगी बढ़ाने पर काम किया जा रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, बकरी के दूध का उपयोग पनीर से लेकर बेबी फूड तक विभिन्न उत्पादों में किया जा सकता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि वैश्विक स्तर पर और खासकर भारत में बकरी के दूध से बने उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है। पनीर, दही और इन्फेंट फार्मूला (शिशुओं के लिए दूध पाउडर) जैसे मूल्यवर्धित उत्पादों ने डेरी क्षेत्र में मुनाफे के नए अवसर खोल दिए हैं।
इस शोध में डेरी विज्ञान एवं खाद्य प्रौद्योगिकी विभाग के डा. सुनील मीना, शुभम मिश्रा, सुधांशु कन्नौजिया, आर्यामा दिप्त, शालिनी सिंह और राज कुमार दुअरी के साथ महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के डा. कमलेश कुमार मीना भी शामिल रहे। शोध को बीते सप्ताह एल्सेवियर समूह के नीदरलैंड स्थित इंटरनेशनल डेरी जर्नल में प्रकाशित किया गया है।
