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वाराणसी

स्क्रब टाइफस ने बढ़ाई स्वास्थ्य विभाग की चिंता

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बीएचयू की रिपोर्ट से खुलासा: पूर्वांचल समेत कई राज्यों से आ रहे स्क्रब टाइफस के मरीज

वाराणसी। पूर्वी उत्तर प्रदेश में स्क्रब टाइफस तेजी से पांव पसार रहा है। पिछले दो वर्षों से इस बीमारी के मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा देखा जा रहा है। वाराणसी स्थित बीएचयू के सर सुंदरलाल अस्पताल में इस वर्ष कराई गई 2,790 जांचों में 493 मरीज स्क्रब टाइफस से संक्रमित पाए गए हैं। कुल जांचों में 19 प्रतिशत नमूनों का पाजिटिव होना स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए गंभीर संकेत माना जा रहा है।

अस्पताल में सामने आए ये मरीज केवल पूर्वांचल तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बिहार, बंगाल, मध्य प्रदेश और झारखंड के विभिन्न जिलों से भी उपचार के लिए पहुंचे थे। पिछले वर्ष जून से दिसंबर के बीच 2,512 संदिग्ध मरीजों की जांच की गई थी, जिनमें 481 केस पाजिटिव पाए गए थे, जो कुल का लगभग 17 प्रतिशत था।

मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए जनरल मेडिसिन विभाग की ओर से एडवाइजरी जारी करने की तैयारी की जा रही है। अधिकांश चिकित्सकों की ओपीडी में स्क्रब टाइफस को लेकर मरीजों की काउंसिलिंग शुरू कर दी गई है। वहीं माइक्रोबायोलॉजी विभाग में किए गए शोध के दौरान बीमारी से जुड़े कई नए तथ्य सामने आए हैं।

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आइएमएस के डीन रिसर्च प्रो. गोपालनाथ और डॉ. मनोज कुमार के अनुसार, स्क्रब टाइफस एक गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण है, जो ओरिएंटिया त्सुत्सुगामुशी नामक जीवाणु के कारण होता है। यह रोग मुख्य रूप से झाड़ियों, घास-फूस और खेतों में पाए जाने वाले सूक्ष्म कीट चिगर माइट (लाल कीट) के काटने से फैलता है। इसी वजह से खेतों में काम करने वाले किसान, मजदूर और ग्रामीण आबादी पर इसका खतरा अधिक बना रहता है।

रोग के प्रारंभिक लक्षण तेज बुखार, सिरदर्द और बदन दर्द होते हैं, जो डेंगू या सामान्य वायरल फीवर जैसे लगते हैं। इसी कारण कई मामलों में बीमारी की पहचान देर से हो पाती है और स्थिति गंभीर हो जाती है। हालांकि अब बुखार और वायरल रोगों को लेकर बढ़ी जागरूकता तथा आइजीएम एलिसा टेस्ट की उपलब्धता से स्क्रब टाइफस की पहचान पहले की तुलना में आसान हो गई है।

चिकित्सकों के अनुसार, त्सुत्सुगामुशी ट्रायंगल क्षेत्र उत्तर में पूर्वी रूस, दक्षिण में ऑस्ट्रेलिया, पूर्व में जापान और पश्चिम में पाकिस्तान तक फैला हुआ है। भारत इस त्रिभुज के भीतर स्थित होने के कारण यहां स्क्रब टाइफस का पाया जाना भौगोलिक दृष्टि से स्वाभाविक है। देश में इस रोग का पहला वैज्ञानिक विवरण वर्ष 1938 में कुमाऊं क्षेत्र से मिला था। उत्तर प्रदेश में वर्ष 1945 में इसके मामलों की पुष्टि हुई थी। लंबे समय तक यह रोग सीमित रूप में सामने आता रहा, लेकिन वर्ष 2012 में राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र द्वारा कई राज्यों में इसके प्रकोप की घोषणा के बाद स्पष्ट हुआ कि स्क्रब टाइफस देश के बड़े हिस्से में फैल चुका है।

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