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गोरखपुर

न्याय की आस में गोरखपुर के किसान सड़कों पर

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गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण (गीडा) क्षेत्र के मौजा ककना चक पत्ता में शासन–प्रशासन के अंतरघाती समीकरणों ने किसानों के भीतर गहरा रोष पैदा कर दिया है। एक ओर प्रशासन द्वारा यह आश्वासन दिया जाता है कि “आपको उजाड़ा नहीं जाएगा”, वहीं दूसरी ओर पेट्रोल छिड़ककर आग लगाने जैसी नीतियां छोटे व सीमांत किसानों को बेघर करने की साज़िश की तरह महसूस होती हैं। आवासीय भूखंड से लेकर उपजाऊ जमीन तक पर दावेदारी कर रहा गीडा प्रशासन ग्रामीणों की पीड़ा को और भी गहरा कर रहा है। किसानों के बीच एक कहावत आज फिर सच होती दिख रही है—“जबरा मारे और रोने भी ना दे।”

पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य सुनील कुमार ने बताया कि गीडा की नियमावली स्पष्ट कहती है कि 80% सहमति के आधार पर ही भूमि अधिग्रहण किया जाना चाहिए। लेकिन मौजा ककना चक पत्ता में हालात इसके उलट हैं। करीब 99% किसान, जो बेहद गरीब, पिछड़े व छोटे रकबे की जमीन पर निर्भर हैं, उनकी जमीन भी बिना स्पष्ट सहमति के अधिग्रहित करने की प्रक्रिया से गुजर रही है। जिन परिवारों के पास बढ़ते परिवार के लिए मकान बनाने तक की जमीन नहीं बची, उन्हें पूर्णत: बेदखल करने की कवायद किसानों को आत्मदाह जैसी चरम स्थिति की ओर धकेल रही है।

वहां मौजूद किसानों, महिलाओं और बच्चों की करुण पुकार ने हर किसी को विचलित कर दिया। छोटे रकबे के किसान, जो सब्ज़ियों की खेती कर किसी तरह अपने परिवार का पेट पालते हैं, आज इस डर में हैं कि यदि यह जमीन भी चली गई तो उनके बच्चों की भूख मिटाने का सहारा तक नहीं बचेगा। कई महिलाओं ने रोते हुए बताया—“अगर जमीन छीन ली गई तो हमारा परिवार भूखमरी के कगार पर पहुंच जाएगा। सरकार हमें जीने का आखिरी सहारा भी छीन रही है।”

एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने भी किसानों की वेदना को स्वर देते हुए कहा कि इन परिवारों के पास आजीविका का कोई दूसरा साधन नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया—“जब जीवन ही संकट में पड़ जाए तो यह कैसा विकास? मोदी सरकार और हमारे मुख्यमंत्री बाबा योगी आदित्यनाथ जी की नजर इन गरीब परिवारों पर कब पड़ेगी?” उन्होंने कहा कि वर्षों से दर्द झेलते–झेलते कितने किसानों की ज़िंदगियाँ समय से पहले समाप्त हो गईं, शायद उनकी आत्माएं भी न्याय की प्रतीक्षा में तड़प रही होंगी।

किसानों ने बताया कि बाबा योगी आदित्यनाथ जी महाराज को उन्होंने जनता दर्शन में भी अपनी पीड़ा बताई थी, जिस पर मुख्यमंत्री ने उचित कार्रवाई के निर्देश दिए थे। इसी आशा को थामे आज सैकड़ों की संख्या में किसान, महिलाएँ और मासूम बच्चे मंडलायुक्त कार्यालय पहुंचे। सभी ने अपनी व्यथा सुनाते हुए लिखित ज्ञापन सौंपा और न्याय की गुहार लगाई।

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ककना चक पत्ता की यह लड़ाई सिर्फ जमीन की नहीं, जीवन और अस्तित्व की लड़ाई है। किसानों की उम्मीद अब प्रशासन की पारदर्शिता, मुख्यमंत्री के निर्देशों के पालन और न्यायपूर्ण निर्णय पर टिक गई है। पीड़ा से भरी इन आवाज़ों ने आज फिर साफ कर दिया कि जब तक न्याय नहीं मिलता, तब तक उनकी यह लड़ाई थमती नहीं—क्योंकि यह लड़ाई सिर्फ खेत का नहीं, बल्कि भविष्य का सवाल है।

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