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गाजीपुर

विलुप्त होती जा रही है ‘दो बैलों की जोड़ी’ की परंपरा

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बहरियाबाद (गाजीपुर)। भारतवर्ष की पहचान लंबे समय तक कृषि और ग्रामीण संस्कृति से रही है, जिसमें खेतों की जुताई के लिए ‘दो बैलों की जोड़ी’ एक अहम प्रतीक मानी जाती थी। लेकिन आधुनिकता और मशीनीकरण की दौड़ में यह परंपरा धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंच गई है।

कभी गांवों की आत्मा माने जाने वाले बैल, जो खेतों की जुताई में किसान के सबसे बड़े सहायक होते थे, अब खेतों से गायब होते जा रहे हैं। अब खेतों में हल और बैल की जगह ट्रैक्टर, पावर टिलर, रोटावेटर, कल्टीवेटर जैसी मशीनों ने ले ली है। आधुनिक यंत्रों की तेजी और दक्षता ने जहां किसानों का समय और श्रम बचाया है, वहीं पारंपरिक खेती के स्वरूप को पीछे छोड़ दिया है।

बड़े किसान जहां खुद के ट्रैक्टर खरीद चुके हैं, वहीं छोटे किसान भी अब किराए पर मशीनें लेकर खेतों की जुताई करना अधिक सुविधाजनक समझते हैं। बैलों को पालने में लगने वाला खर्च, जगह और श्रम के साथ-साथ नई पीढ़ी की आधुनिक सोच भी इस बदलाव का बड़ा कारण बन रही है।

हालांकि, कृषि विशेषज्ञ मानते हैं कि बैलों से खेतों की जुताई मिट्टी के लिए ज्यादा अनुकूल होती है। इससे मिट्टी की ऊपरी परत कठोर नहीं होती और हवा-पानी का संचार बेहतर होता है। पारंपरिक खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का भी कम उपयोग होता है, जिससे पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

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सरकारें जहां एक ओर आधुनिक कृषि यंत्रों पर सब्सिडी और ऋण योजनाएं चला रही हैं, वहीं कुछ राज्य जैसे राजस्थान ‘बैल जोड़ी अनुदान योजना’ जैसे कार्यक्रमों से पारंपरिक खेती को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं। हालांकि इन योजनाओं का प्रभाव सीमित नजर आता है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन और श्रम आधारित खेती की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे में कृषि विशेषज्ञों और किसान संगठनों की मांग है कि केंद्र व राज्य सरकारें पारंपरिक खेती को संरक्षण देने के लिए विशेष योजनाएं बनाएं, ताकि ‘दो बैलों की जोड़ी’ जैसे प्रतीक मात्र इतिहास न बन जाएं।

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