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वाराणसी

फ्लाईओवर-अंडरपास के लिए मिट्टी की ऊंची दीवारों पर रोक

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वाराणसी। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने देशभर में फ्लाईओवर और अंडरपास निर्माण को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाने के उद्देश्य से अहम तकनीकी बदलाव लागू किए हैं। नई व्यवस्था के तहत अब 10 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली रीइंफोर्स्ड स्वायल (आरएस) दीवारों, जिन्हें आम तौर पर मिट्टी की दीवार कहा जाता है, के निर्माण पर रोक लगा दी गई है।

प्राधिकरण द्वारा किए गए निरीक्षणों में सामने आया कि आरएस दीवारों से बने कई ढांचे निर्माण के दो से तीन वर्षों के भीतर ही क्षतिग्रस्त होने लगे थे या उनमें दरारें पड़ रही थीं। इन खामियों के पीछे मुख्य कारण स्टील कनेक्टर में जंग लगना, दीवारों का बाहर की ओर झुकना तथा एप्रोच स्लैब का अतिरिक्त भार पाया गया। इन जोखिमों को देखते हुए सड़क सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए यह निर्णय लिया गया है।

नई गाइडलाइन के अनुसार, अब जमीनी स्तर से 10 मीटर से अधिक ऊंची आरएस दीवारें नहीं बनाई जाएंगी। यदि ऊंचाई बढ़ाना आवश्यक होगा, तो पुल की लंबाई बढ़ाकर एप्रोच रोड की ऊंचाई को नियंत्रित किया जाएगा। साथ ही, फ्लाईओवर और अंडरपास में अब केवल रीइंफोर्स्ड सीमेंट कंक्रीट (आरसीसी) विंग वॉल का ही उपयोग किया जाएगा और आरएस दीवारों का प्रयोग पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा।

जल निकासी व्यवस्था में भी बदलाव किया गया है। पुरानी जियो-कंपोजिट लेयर को समाप्त कर अब 600 मिलीमीटर चौड़ी ड्रेनेज व्यवस्था अनिवार्य कर दी गई है। इसके अलावा क्रैश बैरियर और फ्रिक्शन स्लैब को स्वतंत्र इकाई के रूप में विकसित किया जाएगा, ताकि उनका भार सीधे दीवारों पर न पड़े।

ये नए नियम सभी आगामी टेंडरों के साथ-साथ उन परियोजनाओं पर भी लागू होंगे, जहां निर्माण कार्य अभी शुरू नहीं हुआ है या डिजाइन में संशोधन की संभावना है। प्राधिकरण अब अर्थ रिटेनिंग एबटमेंट जैसी मजबूत संरचनाओं को बढ़ावा देने पर जोर दे रहा है, जिससे बुनियादी ढांचे की आयु बढ़े और सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

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आरएस दीवार, जिसे सामान्य भाषा में मिट्टी की दीवार कहा जाता है, फ्लाईओवर के एप्रोच मार्गों के किनारे लगाए गए कंक्रीट ब्लॉकों के माध्यम से मिट्टी को थामकर रखती है। इसमें मिट्टी के भीतर लोहे की पट्टियां या प्लास्टिक जाल बिछाए जाते हैं, जो संरचना को मजबूती देते हैं। हालांकि यह तकनीक अपेक्षाकृत सस्ती और झटकों को सहने वाली मानी जाती थी, लेकिन अधिक ऊंचाई पर इसके असफल होने की आशंका बढ़ने के कारण अब इसे सीमित कर दिया गया है।

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