गोरखपुर
UGC कानून पर जनप्रतिनिधियों को चेतावनी – शिक्षा से समझौता बर्दाश्त नहीं
गोरखपुर। देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़े UGC कानून और उससे संबंधित हालिया निर्णयों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या नीति निर्माण में छात्रों, युवाओं और सामाजिक संतुलन के हितों को प्राथमिकता दी जा रही है। विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े प्रभावशाली चेहरों की मौजूदगी के बावजूद शिक्षा जगत में असंतोष लगातार बढ़ रहा है।
UGC जैसी संवैधानिक और राष्ट्रीय महत्व की संस्था से यह अपेक्षा की जाती है कि वह विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, समान अवसर और अकादमिक स्वतंत्रता की रक्षा करे। लेकिन हालिया प्रस्तावों और नियमों को लेकर छात्र संगठनों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच यह धारणा बन रही है कि निर्णय ऊपर से थोपे जा रहे हैं, जिनका ज़मीनी हकीकत से सीधा संवाद नहीं है।
राजनीतिक दल कोई भी हों कांग्रेस हो या भाजपा UGC से जुड़े पदों पर बैठे लोगों की जिम्मेदारी पार्टी लाइन से ऊपर उठकर देश की शिक्षा प्रणाली के प्रति होनी चाहिए। सवाल यह भी है कि क्या नीति निर्माण में विविध सामाजिक पृष्ठभूमि, क्षेत्रीय असमानताओं और ग्रामीण भारत की वास्तविक चुनौतियों को पर्याप्त रूप से सुना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा कानूनों में जल्दबाज़ी और बिना व्यापक विमर्श के बदलाव, विश्वविद्यालयों को कमजोर कर सकते हैं। इससे न केवल छात्रों का भविष्य प्रभावित होगा, बल्कि देश की बौद्धिक पूंजी को भी दीर्घकालिक नुकसान पहुंचेगा। UGC के निर्णयों पर पारदर्शिता, सार्वजनिक विमर्श और संसदीय जवाबदेही अनिवार्य होनी चाहिए।
यह खबर किसी व्यक्ति या समुदाय पर आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने की चेतावनी है। शिक्षा राष्ट्र की रीढ़ है और इससे किसी भी प्रकार का राजनीतिक या वैचारिक प्रयोग स्वीकार्य नहीं हो सकता। अब समय है कि UGC से जुड़े सभी जिम्मेदार लोग अपने निर्णयों की कसौटी छात्र हित, संविधान और राष्ट्रीय भविष्य पर कसे। यही लोकतंत्र और शिक्षा, दोनों की मांग है।
