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गोरखपुर

वर्षों से कार्यरत पत्रकारों पर इस्तीफे का दबाव

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गोरखपुर। कभी निष्पक्ष, निर्भीक और जनसरोकारों की पत्रकारिता का प्रतीक रहे राष्ट्रीय सहारा समूह से जुड़ा गोरखपुर संस्करण इन दिनों गंभीर संकट और विवाद के दौर से गुजर रहा है। गोरखपुर में कार्यरत राष्ट्रीय सहारा के पत्रकारों और कर्मचारियों के साथ प्रबंधन समिति द्वारा लगातार अन्यायपूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है। वर्षों से अपने खून-पसीने से संस्थान को खड़ा करने वाले, उसे पहचान दिलाने वाले वफादार पत्रकारों और कर्मचारियों से अब जबरन इस्तीफा मांगा जा रहा है, जिससे पत्रकारिता जगत में आक्रोश और चिंता दोनों व्याप्त हैं।

बताया जा रहा है कि राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर में कई ऐसे पत्रकार और कर्मचारी हैं, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी संस्थान का साथ नहीं छोड़ा। दिन-रात मेहनत कर, सीमित संसाधनों में भी खबरों को जन-जन तक पहुंचाया, संस्थान की साख और विश्वसनीयता बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी। चाहे आपदा हो, आंदोलन हो, चुनाव हों या सामाजिक सरोकारों से जुड़ी खबरें—इन पत्रकारों ने हर मोर्चे पर संस्थान के झंडे को बुलंद रखा। इसके बावजूद आज वही कर्मचारी और पत्रकार प्रबंधन समिति के निशाने पर हैं।

प्रबंधन समिति द्वारा बिना किसी स्पष्ट कारण, बिना पूर्व सूचना और बिना किसी ठोस प्रक्रिया के पत्रकारों और कर्मचारियों पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया जा रहा है। जिन लोगों ने वर्षों तक ईमानदारी से सेवा दी, उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है, ताकि वे स्वयं ही नौकरी छोड़ने को मजबूर हो जाएं। यह स्थिति न केवल अमानवीय है, बल्कि श्रम कानूनों और पत्रकारिता की नैतिकता के भी खिलाफ है।

पत्रकारों और कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने अपना जीवन, समय और ऊर्जा इस संस्थान को देने में लगा दी। कई कर्मचारियों ने अन्य अवसर छोड़कर सहारा को प्राथमिकता दी, क्योंकि उन्हें संस्थान की विचारधारा और मूल्यों पर भरोसा था। आज वही भरोसा टूटता नजर आ रहा है। जिन हाथों ने संस्थान को आगे बढ़ाया, आज उन्हीं हाथों को बेरोजगारी की ओर धकेला जा रहा है।

पत्रकारों का यह भी कहना है कि प्रबंधन समिति का रवैया पूरी तरह एकतरफा और असंवेदनशील हो गया है। न तो कर्मचारियों की समस्याएं सुनी जा रही हैं और न ही उनके भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट नीति सामने रखी जा रही है। अचानक इस्तीफा मांगना, वह भी उन कर्मचारियों से जो वर्षों से सेवा दे रहे हैं, यह दर्शाता है कि प्रबंधन अब अपने ही लोगों को बोझ समझने लगा है।

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यह मुद्दा केवल कुछ कर्मचारियों की नौकरी का नहीं है, बल्कि पूरी पत्रकारिता बिरादरी के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि बड़े और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में भी इस तरह से कर्मचारियों को हटाया जाएगा, तो मीडिया की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ेगा। जब पत्रकार ही असुरक्षित होंगे, तो वे समाज के लिए निष्पक्ष आवाज कैसे उठा पाएंगे।

पत्रकारिता से जुड़े संगठनों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि राष्ट्रीय सहारा जैसे बड़े संस्थान से इस तरह के व्यवहार की उम्मीद नहीं की जा सकती। सहारा समूह ने हमेशा सामाजिक सरोकारों और मानवीय मूल्यों की बात की है, लेकिन गोरखपुर में उसके विपरीत तस्वीर सामने आ रही है। यदि समय रहते इस अन्याय को नहीं रोका गया, तो यह मामला और गंभीर रूप ले सकता है।

प्रभावित पत्रकारों और कर्मचारियों ने मांग की है कि प्रबंधन समिति तत्काल अपना फैसला वापस ले, जबरन इस्तीफा लेने की प्रक्रिया बंद करे और कर्मचारियों के साथ संवाद स्थापित करे। साथ ही, यह भी मांग की जा रही है कि पत्रकारों और कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा के लिए श्रम विभाग और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को हस्तक्षेप करना चाहिए।

यह समय है कि पत्रकारिता से जुड़े सभी लोग, कर्मचारी संगठन और समाज के जिम्मेदार नागरिक इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचें। आज यदि गोरखपुर में राष्ट्रीय सहारा के पत्रकारों और कर्मचारियों के साथ अन्याय हो रहा है, तो कल यह स्थिति किसी और संस्थान में भी उत्पन्न हो सकती है। पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज का आईना है। और जब इस आईने को थामने वाले हाथ ही कमजोर कर दिए जाएंगे, तो समाज को सच्चाई कौन दिखाएगा।

राष्ट्रीय सहारा, गोरखपुर में कार्यरत पत्रकारों और कर्मचारियों के साथ हो रहा यह कथित अन्याय न केवल संस्थान की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि पूरी मीडिया इंडस्ट्री के लिए एक गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है। अब देखना यह है कि प्रबंधन समिति इस आवाज को सुनती है या वफादार पत्रकारों और कर्मचारियों को यूं ही हाशिये पर धकेल दिया।

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