बलिया
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के वैश्विक मंच पर गूंजी बलिया की आवाज
बलिया/झांसी। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘बुंदेलखंड के साहित्य, समाज और संस्कृति में श्रीराम’ में बलिया के प्रतिष्ठित विद्वान एवं चिंतक डॉ. विद्यासागर उपाध्याय ने ‘बीज वक्ता’ और विशिष्ट अतिथि के रूप में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई। अपने उद्बोधन में उन्होंने सनातन संस्कृति और रामकथा के गहरे संबंधों का तार्किक व दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए रामायण के एक मार्मिक प्रसंग का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि जब श्रीराम ने ऋषियों के अस्थि-अवशेषों का ढेर देखा और उसके पीछे का कारण जाना, तब उन्हें ज्ञात हुआ कि ज्ञान परंपरा को समाप्त करने के उद्देश्य से राक्षसों ने अनेक ऋषियों का वध किया था। उस काल में ज्ञान श्रुति परंपरा से संरक्षित था, इसलिए एक ऋषि की हत्या केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं बल्कि संचित ज्ञान की धरोहर पर प्रहार था। इस संदर्भ में उन्होंने श्रीराम के संकल्प को अन्याय और ज्ञान-विरोधी शक्तियों के विरुद्ध पहला व्यापक सांस्कृतिक प्रतिरोध बताया, जिसने सभ्यता और मूल्य-परंपरा की रक्षा का मार्ग प्रशस्त किया।
आगे उन्होंने प्रतिपादित किया कि बुंदेलखंड की धरती पर राम केवल आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति के आधार हैं। ओरछा के रामराजा सरकार से लेकर लोक परंपराओं की फाग और आल्हा तक राम की उपस्थिति समाज के व्यवहार, संस्कृति और नैतिक मूल्यों में दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि बुंदेली साहित्य ने लोकभाषा के माध्यम से राम के आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य किया है, जिससे यह क्षेत्र कठिन परिस्थितियों में भी मर्यादा और धैर्य का संबल पाता रहा है।
संगोष्ठी में भारत सहित दस देशों के विद्वानों ने भाग लेकर श्रीराम के आदर्शों और बुंदेली संस्कृति के विविध आयामों पर विमर्श किया तथा लगभग सौ शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। कार्यक्रम में रामायण केंद्र भोपाल के निदेशक प्रो. राजेश श्रीवास्तव और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की संपादक डॉ. अमिता दुबे की उपस्थिति रही, जबकि अध्यक्षता कुलपति प्रो. मुकेश पाण्डेय ने की।
आयोजन को सफल बनाने में कला संकाय के अधिष्ठाता एवं संयोजक प्रो. पुनीत बिसारिया, कुलसचिव ज्ञानेंद्र कुमार, वित्त अधिकारी प्रमोद कुमार सिंह और परीक्षा नियंत्रक राज बहादुर की प्रमुख भूमिका रही। डॉ. उपाध्याय के सम्मानित होने पर बलिया के साहित्यकारों और शिक्षाविदों में हर्ष व्यक्त किया गया और इसे जनपद के लिए गौरवपूर्ण उपलब्धि बताया गया।
