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गोरखपुर

नरकटहा मौजा में मिट्टी की लूट से उजड़े गरीबों के सपने, खनन माफिया का खुला खेल जारी

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भूमाफिया–खनन माफिया–पुलिस गठजोड़ के आरोप, शिकायतों के बावजूद कार्रवाई शून्य

गोरखपुर के खजनी रोड पर स्थित नरकटहा मौजा, जिसे कभी बाबा गोरक्षनाथ न्यू कॉलोनी के नाम से सुरक्षित आवासीय क्षेत्र का सपना दिखाया गया था, आज वही इलाका गरीब और असहाय लोगों के लिए भय, धोखे और अन्याय की प्रतीक बन चुका है। यहां खनन माफिया, भूमाफिया और स्थानीय पुलिस की कथित मिलीभगत ने सरकार की “गरीब हितैषी” छवि पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।

आरोप है कि छपिया निवासी प्लॉट विक्रेता अनिल सिंह और उनके सगे–संबंधियों ने गीडा क्षेत्र में आने वाली जमीन को फर्जी तरीके से “साफ-सुथरी आवासीय भूमि” बताकर करीब पांच दर्जन भोली-भाली जनता को बेच दिया। वर्षों की कमाई, जीवनभर की पूंजी और सुरक्षित भविष्य का सपना लेकर लोगों ने जमीन खरीदी, लेकिन आज वही जमीन उनके लिए अभिशाप बनती जा रही है।

स्थिति तब और भयावह हो गई जब उन्हीं प्लॉटों के बीच रात के अंधेरे में जेसीबी मशीन और डंपरों से खुलेआम मिट्टी की चोरी शुरू हो गई। आरोप है कि खनन के दौरान जानबूझकर लाइटें बंद कर दी जाती हैं ताकि कोई विरोध या पहचान न हो सके। यह पूरा खेल खनन माफिया की संलिप्तता से चल रहा है, और सबसे चिंताजनक बात यह है कि सूचना देने के बावजूद जिम्मेदार विभागों और स्थानीय पुलिस की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

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स्थानीय लोगों का कहना है कि जब खजनी पुलिस को खुदाई की सूचना दी जाती है तो जवाब मिलता है—“जब खुदाई चल रही हो, तभी बताइए।” यह जवाब ऐसा प्रतीत होता है जैसे गोली चलने से रोकना जरूरी नहीं, गोली चल जाए तब खबर करना काफी है। ऐसी कार्यप्रणाली पुलिस की मंशा को संदेह के घेरे में खड़ा करती है और कानून–व्यवस्था पर गहरा प्रश्नचिह्न लगाती है।

एक तरफ भूमाफिया अनिल सिंह और उनके सगे संबंधी विवादित जमीन से दूरी बनाकर गीडा कार्यालयों के चक्कर लगाते नजर आते हैं, दूसरी तरफ पीड़ित लोग अपने ही खरीदे प्लॉट को बचाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं। जिन जमीनों पर घर बनने थे, बच्चों का भविष्य संवरना था, वहां आज गड्ढे, डर और अनिश्चितता पसरी हुई है। यह केवल मिट्टी की चोरी नहीं, बल्कि गरीबों के सपनों की खुली लूट है।

सरकार एक ओर गरीबों के हित की बात करती है, दूसरी ओर जमीनी हकीकत यह है कि दबदबा रखने वाले माफिया खुलेआम कानून को ठेंगा दिखा रहे हैं। “जबरा मारे और रोने भी न दे” वाली कहावत नरकटहा मौजा के निवासियों पर पूरी तरह चरितार्थ हो रही है। प्रशासनिक चुप्पी और पुलिस की निष्क्रियता ने इस अन्याय को और मजबूत किया है।

अब सवाल यह है कि क्या शासन–प्रशासन इस गंभीर मामले का संज्ञान लेगा? क्या भूमाफिया, खनन माफिया और उनकी कथित संरक्षक पुलिस कार्यप्रणाली पर कोई कठोर कार्रवाई होगी? या फिर नरकटहा मौजा के गरीब, असहाय लोग यूं ही अपने अधूरे सपनों के साथ इस लोक से उस लोक तक जाने को मजबूर होते रहेंगे। यह केवल एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है, जहां कानून कमजोर और माफिया मजबूत नजर आते हैं।

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