गोरखपुर
खाद की थैली हल्की, संकट भारी: भारत के राजपत्र में दर्ज फैसला और किसान की बढ़ती चिंता
गोरखपुर। भारत के राजपत्र में प्रकाशित नवीन अधिसूचना के अनुसार यूरिया खाद की थैली एक बार फिर बदली जा रही है। पहले 50 किलो से 45 किलो और अब वर्ष 2026 से 40 किलो की थैली लागू करने का निर्णय लिया गया है। सरकार का तर्क है कि यह नया यूरिया 37 प्रतिशत नाइट्रोजन और 17 प्रतिशत सल्फर युक्त होगा तथा इसका मूल्य 254 रुपये प्रति बैग निर्धारित किया गया है। कागजों में यह फैसला “पोषण संतुलन” और “मिट्टी की सेहत” सुधारने की दिशा में बताया जा रहा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत में यह निर्णय किसानों के लिए संकट का नया अध्याय बनकर उभर रहा है।
गोरखपुर के खजनी क्षेत्र के किसान रामनारायण यादव कहते हैं, “नाम वही यूरिया है, दाम भी बढ़े-चढ़े से हैं, लेकिन बोरी हर बार हल्की होती जा रही है। खेत तो पहले जितना ही बड़ा है, खाद कम पड़ेगी तो लागत कैसे नहीं बढ़ेगी?”
वहीं बस्ती जिले के कप्तानगंज के किसान शिवकुमार पांडेय भावुक स्वर में कहते हैं, “राजपत्र में फैसला छप जाना बहुत आसान है, लेकिन उस फैसले का बोझ किसान की कमर पर पड़ता है। एक एक दाना खाद के लिए हमें लाइन में लगना पड़ता है।”
किसानों का कहना है कि 40 किलो की थैली से प्रति एकड़ खाद की वास्तविक उपलब्धता घटेगी, जिससे या तो अधिक थैलियाँ खरीदनी पड़ेंगी या फिर फसल की पैदावार प्रभावित होगी। महंगाई पहले से ही डीजल, बीज और कीटनाशकों के रूप में किसान को जकड़े हुए है। ऐसे में खाद की मात्रा कम होना उनके लिए दोहरी मार साबित हो रही है।
संतकबीरनगर के किसान मुन्नालाल निषाद कहते हैं, “सरकार कहती है किसान अन्नदाता है, लेकिन फैसलों में उसका हनन साफ दिखता है। अगर यही नीति रही तो छोटे किसान खेती छोड़ने को मजबूर हो जाएंगे।”
ग्रामीण अंचलों में यह चर्चा आम है कि भारत के राजपत्र में दर्ज यह बदलाव किसानों की सहमति और ज़मीनी हालात को समझे बिना किया गया निर्णय है।
कुल मिलाकर, यूरिया की थैली का हल्का होना केवल वजन का सवाल नहीं है, यह किसान की जेब, उसकी उपज और उसके भविष्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। अगर समय रहते सरकार ने किसानों की आशंकाओं पर ध्यान नहीं दिया, तो यह फैसला खेती-किसानी के लिए संकट का प्रतीक बन सकता है, न कि सुधार का।
