धर्म-कर्म
14 नहीं 15 जनवरी को क्यों मनाई जाएगी मकर संक्रांति? जानिए काशी के विद्वानों की गणना
वाराणसी। सूर्य की राशि परिवर्तन से प्रकृति में होने वाली क्रांति का पर्व मकर संक्रांति इस वर्ष 15 जनवरी, गुरुवार को मनाया जाएगा। इस दिन सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश कर उत्तरायण हो जाते हैं। सूर्य के उत्तरायण होते ही प्रकृति में परिवर्तन आरंभ हो जाता है, दिन बड़े होने लगते हैं, प्रकाश की अवधि बढ़ती है और शीत ऋतु का प्रभाव कम होना शुरू हो जाता है।
काशी के विद्वानों के अनुसार सूर्यदेव 14 जनवरी की रात 9.39 बजे धनु से मकर राशि में प्रवेश करेंगे। श्रीकाशी विद्वत परिषद के संगठन मंत्री एवं काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार पांडेय ने बताया कि सनातन धर्म में पर्व-व्रतों का निर्धारण ऋषियों द्वारा प्रतिपादित व्यवस्था के अनुसार सूर्य सिद्धांतादि पारंपरिक गणित पर आधारित होता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार संक्रांति की घटना अत्यंत सूक्ष्म समय में घटित होती है, इसलिए ठीक उसी समय पर्व, स्नान या दान नहीं किया जाता। इसी कारण मनीषियों ने संक्रांति के बाद आठ से 16 घंटे तक की अवधि को पर्व, स्नान-दान और पुण्यकर्म के लिए निर्धारित किया है।
रात में संक्रांति होने पर उसका पुण्यकाल अगले दिन तक माना जाता है। इसी आधार पर मकर संक्रांति का पर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन सूर्योदय से दोपहर 1.39 बजे तक स्नान-दान का पुण्यकाल रहेगा।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभाग के प्रोफेसर डॉ. सुभाष पांडेय ने बताया कि सामान्यतः गुरुवार को खिचड़ी का सेवन नहीं किया जाता, लेकिन इस बार मकर संक्रांति स्वयं गुरुवार को पड़ रही है। ऐसे में गुरुवासरीय वर्जना की महत्ता नहीं रह जाती और पर्व पर खिचड़ी का दान व भोजन करना ही महत्वपूर्ण और पुण्य फलदायी माना गया है। लोग खिचड़ी बना सकते हैं, खा सकते हैं और दान भी कर सकते हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि संयोगवश इसी दिन तिल द्वादशी भी है। मान्यता के अनुसार माघ मास की कृष्ण द्वादशी को भगवान विष्णु के शरीर से तिल की उत्पत्ति हुई थी। पर्व के दिन माघ मास, तिल द्वादशी और वृद्धि योग की युति होने से इसका महात्म्य और अधिक फलदायी माना गया है। अतः इस दिन तिल का उपभोग और तिल का दान अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है।
विद्वानों के अनुसार मकर संक्रांति किसी वर्ष पौष तो किसी वर्ष माघ मास में पड़ती है। माघ मास को स्नान-दान का अत्यंत महत्वपूर्ण मास माना गया है।
