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गोरखपुर

संत परंपरा का सम्मान करें समाज: गुरु बृज किशोर तिवारी ने श्रीराम और भरत के आदर्शों से दी सीख

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गोरखपुर के दक्षिणांचल की पावन धरती रुद्रपुर–खजनी क्षेत्र सदियों से संतों, विद्वानों और संस्कृति साधकों की तपोभूमि रही है। इसी पवित्र भूमि पर विराजमान हैं आदरणीय शिक्षक, लोकसंस्कृति के साधक और आध्यात्मिक चिंतन के प्रखर व्यक्तित्व गुरु श्री बृज किशोर तिवारी उर्फ गुलाब तिवारी। जिनके मन-मस्तिष्क में विद्या की अधिष्ठात्री मां शारदा का निरंतर वास है और जिनकी वाणी में धर्म, संस्कृति और समाज के प्रति गहरी संवेदना तथा जागरण की शक्ति है।

मेरे लिए गुरु श्री बृज किशोर तिवारी केवल शिक्षक नहीं, बल्कि माता-पिता के समान स्नेह देने वाले जीवन मार्गदर्शक हैं। मेरे जीवन की शिक्षा की जो मजबूत नींव आज दिखाई देती है, वह उनके स्नेह, अनुशासन और आशीर्वाद का ही परिणाम है। उन्होंने केवल अक्षर ज्ञान नहीं दिया, बल्कि जीवन के आदर्श, संस्कृति के प्रति सम्मान और राष्ट्रधर्म का भाव भी सिखाया।

गुरु जी के विचारों में आज एक गहरी पीड़ा भी दिखाई देती है। वह पीड़ा इस बात की है कि जिस सनातन संस्कृति ने संसार को त्याग, मर्यादा और धर्म का सर्वोच्च मार्ग दिखाया, वही समाज आज अपने ही आदर्शों और परंपराओं पर प्रश्नचिह्न लगाने लगा है।

गुरु जी अक्सर भगवान श्रीराम और उनके परम भक्त भाई भरत के आदर्शों का उदाहरण देते हैं। वे बताते हैं कि रामायण केवल एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला दिव्य मार्गदर्शन है। उसमें वर्णित भगवान श्रीराम की मर्यादा और भरत का त्याग भारतीय संस्कृति के सर्वोच्च आदर्श हैं।

जब अयोध्या की राजगद्दी भरत को सहज ही मिल सकती थी, तब उन्होंने उस राजसिंहासन को तुच्छ समझते हुए ठुकरा दिया। उनके लिए सत्ता, वैभव और राज्य का कोई महत्व नहीं था। उनके हृदय में केवल अपने आराध्य प्रभु श्रीराम के प्रति अटूट प्रेम और समर्पण था।

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भरत ने राजगद्दी स्वीकार नहीं की, बल्कि भगवान श्रीराम की खड़ाऊं को अयोध्या के सिंहासन पर स्थापित कर स्वयं एक सेवक के रूप में राज्य का संचालन किया। यह त्याग और भक्ति आज भी मानव समाज के लिए सर्वोच्च उदाहरण है।

गुरु जी कहते हैं कि जब हम भरत के इस त्याग को स्मरण करते हैं तो यह भी देखना चाहिए कि आज समाज किस दिशा में जा रहा है। आज कुछ लोग बिना सत्य जाने ही संतों और आध्यात्मिक परंपराओं पर उंगली उठाने लगते हैं।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि संत समाज पर आरोप लगाना या उन्हें अपमानित करना केवल किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि हमारी हजारों वर्षों पुरानी संत परंपरा का अपमान है। यही वह संत परंपरा है जिसने इस देश को आध्यात्मिक चेतना दी, जिसने समाज को अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने का कार्य किया।

भारत की संस्कृति में संत केवल व्यक्ति नहीं होते, बल्कि वह समाज के नैतिक और आध्यात्मिक आधार होते हैं। कबीर, तुलसी, नानक, रामानुज, चैतन्य और अनगिनत संतों ने अपने त्याग, तपस्या और करुणा से मानवता को दिशा दी है।

गुरु जी का कहना है कि यदि कहीं कोई व्यक्ति संत वेश धारण करके गलत आचरण करता है तो उसके लिए पूरी संत परंपरा को दोष देना उचित नहीं है। जैसे एक वृक्ष की एक सूखी शाखा पूरे वृक्ष को दोषी नहीं बनाती, उसी प्रकार कुछ अपवादों के कारण संतों की महान परंपरा को कटघरे में खड़ा करना भी न्यायसंगत नहीं है।

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उन्होंने समाज को सचेत करते हुए कहा कि संतों पर उंगली उठाने से पहले हमें उनके त्याग, तपस्या और समाज के लिए किए गए महान कार्यों को भी याद करना चाहिए। आज भी हजारों संत ऐसे हैं जो बिना किसी स्वार्थ के समाज की सेवा और मानव कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित किए हुए हैं।

लोक संस्कृति के क्षेत्र में भी गुरु जी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। वे आकाशवाणी और दूरदर्शन के लोकगीतों के ऐसे साधक हैं जिन्हें लोकधारा का महासम्राट कहा जाता है। उनकी मधुर वाणी में पूर्वांचल की मिट्टी की सुगंध और संस्कृति की गरिमा झलकती है।

रुद्रपुर-खजनी क्षेत्र में स्थित मां कोटही का दिव्य पावन दरबार भी उनके जीवन का आध्यात्मिक केंद्र है। इस पावन स्थल के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा और भक्ति क्षेत्र के लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

आज जब मैं, एक कलमकार के रूप में जयदेश हिन्दी दैनिक समाचार पत्र एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का गोरखपुर-बस्ती मंडल प्रभारी तथा जयहिंद राष्ट्रीय पत्रकार संगठन का राष्ट्रीय सचिव अपने गुरु के इन विचारों को शब्दों में व्यक्त करने का प्रयास करता हूं, तो यह मेरे लिए केवल लेखन नहीं बल्कि गुरु चरणों में श्रद्धा अर्पित करने का एक विनम्र प्रयास है।

गुरु श्री बृज किशोर तिवारी ‘गुलाब तिवारी’ जैसे व्यक्तित्व समाज की अमूल्य धरोहर हैं। उनके विचारों में श्रीराम की मर्यादा, भरत का त्याग और संत परंपरा की पवित्रता का संदेश स्पष्ट झलकता है।

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आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज संतों की परंपरा का सम्मान करे, उनके आदर्शों को समझे और मानव कल्याण की उस दिव्य धारा को आगे बढ़ाए जो सदियों से इस देश की आत्मा रही है। ऐसे पूज्य गुरु, जिनकी वाणी में मां शारदा की कृपा और हृदय में समस्त मानवता के लिए करुणा है, उनके श्री चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।

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