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लब्ध गीतकार पं.हरिराम द्विवेदी की ८८वीं जयंती पैतृक गांव शेरवां में मनायी गयी ‘भूरिश्रवा के भुइली शेरवां’ का लोकार्पण

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शेरवां में हरि भइया स्मृति वाचनालय और मूर्ति स्थापना की सरकार से मांग की गयी

विश्व भोजपुरी संघ द्वारा ऐतिहासिक शेरवां पहाड़ी पर लब्ध गीतकार रहे दिवंगत प्रांतीय अध्यक्ष उ.प्र.भोजपुरी संघ पं.हरिराम द्विवेदी ‘हरि भइया’ की ८८वीं जयंती श्रद्धापूर्वक मनाते हुये उनकी स्मृतियों को चिरस्थाई करने के लिये उनके पैतृक गांव शेरवां में पं.हरिराम द्विवेदी की एक प्रतिमा स्थापित करने और यहां पर हरि भइया स्मृति लोक वाचनालय निर्माण करवाने की सरकार से पुरजोर मांग और अपील की गयी।

पं.अपूर्व नारायण तिवारी ‘बनारसी बाबू’ द्वारा ठेठ भोजपुरी में लिखित पुस्तक ‘भूरिश्रवा के भुइली शेरवां ‘ का लोकार्पण करते हुये उसे पं.हरिराम द्विवेदी ‘हरि भइया’ को समर्पित किया गया।

अध्यक्षीय उद्बोधन करते हुये विश्व भोजपुरी संघ के महासचिव पं.अपूर्व नारायण तिवारी ” बनारसी बाबू “ने कहा कि हरि भइया का पैतृक गांव शेरवां और भुइली कभी महाभारतकालीन राजा भूरिश्रवा की राजधानी थी ।कालांतर में इसी भूरिश्रवा का अपभ्रंश होकर भुइली शेरवां नाम हो गया । यहां भूरिश्रवा द्वारा स्थापित स्तंभ शिवलग स्वरूप में आज भी विद्यमान है ।

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यहां हजारों वर्षों पूर्व गुरुकुल आश्रम हुआ करते थे । हजारों वर्ष प्राचीन रहस्य आज भी यहां भरे पड़े हैं ।आठवीं सदी का गहरवार राजाओं द्वारा बनवाया गया बावन बीघा किला यहां मौजूद है,तो सोलहवीं शताब्दी में शेरशाह सूरी द्वारा बनवाये गये कोस मीनार और डाक चौकी भी खंडहर रुप में आज भी मौजूद हैं ।जिन्हें पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया जाना चाहिये। यहां भुइली खास में बाबा मकदूम शाह की मजार है और यहीं पावन तालाब किनारे इक्कीस दिन तक नौवें सिख गुरु तेग बहादुर सिंह ने ठहर कर उपदेश दिया था । रामसागर पहाड़ी ताल में नहाने से चर्मरोग दूर हो जाते हैं ।

ऐसे तमाम रहस्यों और शोधपरक तथ्यों को पुस्तक में कुल १३५ हायकू गीतों रुप में समाहित किया गया है । सरकार को ऐसे ऐतिहासिक  पौराणिक महत्व के शेरवां भुइली को एक संरक्षित क्षेत्र घोषित करते हुये सभी तरह के अवैध खननों को तत्काल प्रभाव से बंद किया जाना चाहिये ।

इसी ऐतिहासिक पावन शेरवां गांव में जन्मे हरि भइया के गीतों,बरवै छंदों,दोहों से रसपगे माधुर्य कवित्व में ऐसा लोकरस का सरिता प्रवाह है,जो एक रससिद्ध लोकसिद्ध स्वयंसिद्ध कवि मानस से ही नि:सृत हो सकता है और यही अपने लोकभाषा मातृभाषा भोजपुरी की तासीर है ।हरि भइया की यही अंतिम इच्छा थी कि उनकी मातृभाषा भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाये । भारत सरकार को करोड़ों जनमानस की भाषा भोजपुरी को यथाशीघ्र संवैधानिक दर्जा दिया जाना समय की मांग है और ये हरि भइया को सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।

वक्ताओं ने उनकी कृतियों यथा – नारी,नदियो गइल दुबराय, जीवनदायिनी गंगा,पानी कहै कहानी,पातरि पीर,बैन फकीरा, हे देखा हो,रमता जोगी, पहचान, दोहावली,हाशिए का दर्द,साई भजनावली, परिवेश को लोकजीवन का आइना करार देते लोकसंवेदना की धरोहर बताया ।उपस्थित प्रमुख लोगों में श्री प्रकाश खरे, पं.शंभूनाथ पांडेय,प्यारेलाल,रतन गुरु,  राकी,डा.केदार व्यास,संदीप सिंह,हरि सेवक,उमेश खरवार,तरुण सिंह,आशीष पटेल,लालू यादव,डा.अरविंद सिंह,मोहन कुमार,अनिल मौर्य,किशन वाल्मीकि,भइयालाल आदि थे ।

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