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चन्दौली

चंदौली में बरसात: अधिकारियों के लिए आपदा नहीं ‘अवसर’

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डबल इंजन सरकार की योजनाएं जिले में सिर्फ़ कागज़ों तक सीमित

चंदौली। देश की बागडोर संभालने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना था कि हर कस्बे, हर गांव, शहर के गरीब लोगों का अपना पक्का घर हो। प्रधानमंत्री ने अपने इस सपने को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना व मुख्यमंत्री आवास योजना की शुरुआत की, ताकि ऐसे गरीब जिनके घर मिट्टी के हों, उन्हें पक्का घर मुहैया कराया जाए। लेकिन प्रधानमंत्री के इस सपने की हकीकत यह है कि मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभ से पात्र व्यक्ति आज भी वंचित रह गए हैं। सरकार की यह महत्वपूर्ण योजना कागज़ों तक ही सिमट कर रह गई है।

बताते चलें कि विगत दिनों जनपद चंदौली में बारिश व बांधों से छोड़े गए पानी ने जिले के कई गांवों को बाढ़ की चपेट में ला दिया है। एक ओर आम जनता मिट्टी के घरों के ढहने, राशन-पानी की किल्लत व बच्चों के सिर से छत छिनने जैसी त्रासदी से जूझ रही है, वहीं दूसरी ओर यह आपदा जनपद के कई अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के लिए ‘अवसर’ बन गई है।

सबसे आश्चर्यचकित बात यह है कि डबल इंजन सरकार की प्रमुख योजनाएं — प्रधानमंत्री आवास व मुख्यमंत्री आवास योजना संचालित होने के बाद भी बारिश में ढहते मिट्टी के घर यह सवाल उठाते हैं कि आखिर इन योजनाओं का असली लाभ किसे मिल रहा है?

गांवों को छोड़िए, जिले के मुख्य कस्बे मुगलसराय में ऐसे सैकड़ों अपात्र लोग हैं जिन्हें कई वर्ष पहले ही 2.5 लाख रुपये की आवास योजना की राशि का लाभ मिल चुका है। लेकिन गांवों में जिनके घर बरसात में बह गए, ऐसे लोग आज भी योजना के लाभ से वंचित हैं। ये वो लोग हैं जिन्हें प्रधान, सचिव व ब्लॉक स्तर के अधिकारी लगातार नज़रअंदाज़ करते आ रहे हैं।

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जनपद में जब बाढ़ आई, तो नेताओं की ‘संवेदनाएं’ तस्वीरों तक सीमित रहीं। किसी ने कैमरों के सामने खाना बांटा, तो किसी अधिकारी ने राहत सामग्री के डिब्बे वितरित कर मीडिया में बयान दे दिया। लेकिन किसी ने भी यह जानने की कोशिश नहीं की कि बाढ़ में बेघर हुआ यह व्यक्ति अब तक आवास योजना से वंचित क्यों है?

चंदौली जिले को वर्षों से पिछड़ा बनाए रखने की एक अघोषित रणनीति प्रतीत हो रही है। ऐसा लगता है कि योजनाएं ज़मीन पर नहीं, सिर्फ़ कागज़ों तक ही रह गई हैं। भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी व भाई-भतीजावाद ने ऐसे हालात बना दिए हैं कि जनपद में हकदारों को उनकी बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी नहीं हो पा रहीं।

यह बाढ़ कुछ ही दिनों में खत्म हो जाएगी, लेकिन जिनके पास अब घर नहीं है, उनके लिए यह एक लंबी त्रासदी की शुरुआत है। सवाल यह है कि क्या अधिकारियों व नेताओं के वादे सिर्फ़ आपदा की घड़ी तक सीमित हैं? जब कैमरे बंद हो जाएंगे, तब क्या कोई पूछेगा कि इन गरीबों का स्थायी समाधान क्या हुआ?

डबल इंजन की सरकार के तमाम दावों के बीच जब चंदौली जैसे जिले में पात्र व्यक्ति आवास योजना से वंचित रह जाता है, तो क्या यह सिर्फ़ प्रशासन की विफलता है या एक गहरी राजनीतिक रणनीति? इस सवाल पर मंथन करने की ज़रूरत है।

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