गाजीपुर
इलाज नहीं, जांच का जाल! मोहम्मदाबाद के अस्पतालों में मरीजों की जेब पर सीधा वार
मोहम्मदाबाद (गाजीपुर) जयदेश। जनपद के मोहम्मदाबाद में अस्पतालों की हकीकत अब किसी से छिपी नहीं रह गई है। यहां इलाज से ज्यादा “जांच का खेल” हावी होता दिखाई दे रहा है। हालत यह है कि कोई मरीज मामूली सिर दर्द, पेट दर्द या हल्की बीमारी लेकर अस्पताल पहुंचता है, तो उसे भी राहत देने के बजाय सीधे जांच के लिये भेज जाता है।
मरीजों का कहना है कि डॉक्टर अपने अनुभव से प्राथमिक उपचार करने के बजाय तुरंत अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे और अन्य महंगी जांच लिख देते हैं। इससे मरीजों को न सिर्फ आर्थिक बोझ झेलना पड़ता है, बल्कि अस्पतालों और जांच केंद्रों के चक्कर भी काटने पड़ते हैं।
सबसे बड़ी बात यह सामने आ रहा है कि जांच केंद्रों से डॉक्टरों को मोटा कमीशन मिलता है। यही वजह है कि साधारण बीमारी को भी जांच के नाम पर “कमाई का जरिया” बना दिया गया है। मरीजों का कहना है कि एक कलम चलाकर उनकी जेब ढीली कर दी जाती है।
सिर्फ निजी क्लिनिक ही नहीं, बल्कि सरकारी हास्पिटल, ट्रामा सेंटर, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। हर जगह मरीज खुद को एक “सिस्टम” के बीच फंसा हुआ महसूस कर रहा है, जहां बीमारी से ज्यादा उसकी आर्थिक क्षमता का परीक्षण किया जाता है।
वहीं, कई जन औषधि केंद्रों की स्थिति भी सवालों के घेरे में है। जहां सस्ती दवाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए, वहां वे अलमारी में शोपीस बनी रहती हैं। इसके उलट, काउंटर के अंदर महंगी बाहरी दवाओं का भंडार सजा रहता है और मरीजों को वही थमाई जाती हैं।
अगर कोई मरीज सस्ती दवा की मांग करता है, तो उसे यह कहकर टाल दिया जाता है कि वह दवा उपलब्ध नहीं है, जबकि हकीकत इससे बिल्कुल उलट बताई जा रही है। अंदर भंडार भरा है, लेकिन मुनाफे और कमीशन के खेल में सस्ती दवाएं जानबूझकर नजरअंदाज की जाती हैं।
मरीजों के बीच अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि डॉक्टर और दवा केंद्रों के बीच एक “मिलीभगत” काम कर रही है, जिसमें मरीज सिर्फ एक माध्यम बनकर रह गया है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य सेवाएं वाकई सेवा रह गई हैं, या फिर यह एक ऐसा बाजार बन चुका है जहां बीमारी नहीं, बल्कि मरीज की जेब का इलाज किया जाता है?
