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धर्म-कर्म

अनंत पापों से मुक्ति के लिए करें ऋषि-पंचमी व्रत

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रिपोर्ट – प्रदीप कुमार

हिंदू पञ्चाङ्ग के अनुसार प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि को सप्त ऋषि पंचमी के नाम से जाना जाता है,।
इस वर्ष मंगलवार 19 सितम्बर को मनाया जायेगा सप्त ऋषि पंचमी व्रत।
ब्रह्म पुराण के अनुसार भाद्रपद शुक्ल पक्ष पंचमी को सप्त ऋषि पूजा व्रत का विधान है।
इस दिन चारों वर्ण की स्त्रियों को चाहिए कि वे यह व्रत करें।
यह व्रत जाने-अनजाने हुए पापों के पक्षालन के लिए स्त्री तथा पुरुषों को अवश्य करना चाहिए।
इस दिन गंगा स्नान करने का विशेष माहात्म्य है।

ऋषि पंचमी के दिन पूरे विधि-विधान के साथ ऋषियों के पूजन के बाद कथा श्रवण किया जाता है
उक्त बातें आयुष्मान ज्योतिष परामर्श सेवा केन्द्र के संस्थापक साहित्याचार्य ज्योतिर्विद आचार्य चन्दन तिवारी ने बताया कि प्रातः नदी आदि पर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
या तत्पश्चात घर में ही किसी पवित्र स्थान पर पृथ्वी को शुद्ध करके हल्दी से चौकोर मंडल (चौक पूरें) बनाएं।
फिर मध्याह्न काल में सर्वतोभद्र मंडल वेदी स्तापित करें , फिर उस पर सप्त ऋषियों की स्थापना करें।
इसके बाद गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से सप्तर्षियों का पूजन करें।

तत्पश्चात निम्न मंत्र से अर्घ्य दें-
‘ कश्यपोऽत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ गौतमः।
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः॥
दहन्तु पापं मे सर्वं गृह्नणन्त्वर्घ्यं नमो नमः ॥

व्रत कथा सुनकर आरती कर प्रसाद वितरित करें।
तदुपरांत अकृष्ट (बिना बोई हुई) पृथ्वी में पैदा हुए शाकादि का आहार लें।
इस प्रकार सात वर्ष तक व्रत करके आठवें वर्ष में सप्त ऋषियों की सोने की सात मूर्तियां बनवाएं।
तत्पश्चात कलश स्थापन करके यथा विधि पूजन करें।
अंत में सात गोदान तथा सात युग्मक-ब्राह्मण को भोजन करा कर उनका विसर्जन करें।

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ऋषि पंचमी कथा ……..!!

  1. एक समय विदर्भ देश में उत्तक नाम का ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी के साथ निवास करता था।
    उसके परिवार में एक पुत्र व एक पुत्री थी।
    ब्राह्मण ने अपनी पुत्री का विवाह अच्छे ब्राह्मण कुल में कर देता है परंतु काल के प्रभाव स्वरुप कन्या का पति अकाल मृत्यु को प्राप्त होता है, और वह विधवा हो जाती है ।
    तथा अपने पिता के घर लौट आती है।
    एक दिन आधी रात में लड़की के शरीर में कीड़े उत्पन्न होने लगते है़।

अपनी कन्या के शरीर पर कीड़े देखकर माता पिता दुख से व्यथित हो जाते हैं ।
और पुत्री को उत्तक ॠषि के पास ले जाते हैं।
अपनी पुत्री की इस हालत के विषय में जानने की प्रयास करते हैं।
उत्तक ऋषि अपने ज्ञान से उस कन्या के पूर्व जन्म का पूर्ण विवरण उसके माता पिता को बताते हैं ।
और कहते हैं कि कन्या पूर्व जन्म में ब्राह्मणी थी और इसने एक बार रजस्वला होने पर भी घर बर्तन इत्यादि छू लिये थे।
और काम करने लगी बस इसी पाप के कारण इसके शरीर पर कीड़े पड़ गये हैं.

शास्त्रों के अनुसार रजस्वला स्त्री का कार्य करना निषेध है ।
परंतु इसने इस बात पर ध्यान नहीं दिया और इसे इसका दण्ड भोगना पड़ रहा है। ऋषि कहते हैं कि यदि यह कन्या ऋषि पंचमी का व्रत करे और श्रद्धा भाव के साथ पूजा तथा क्षमा प्रार्थना करे तो उसे अपने पापों से मुक्ति हो जाएगी।
इस प्रकार कन्या द्वारा ऋषि पंचमी का व्रत करने से उसे अपने पाप से मुक्ति प्राप्त होती है।

  1. एक अन्य कथा के अनुसार यह कथा श्री कृष्ण ने युधिष्ठर को सुनाई थी।
    कथा अनुसार जब वृजासुर का वध करने के कारण इन्द्र को ब्रह्म हत्या का महान पाप लगा तो उसने इस पाप से मुक्ति पाने के लिए ब्रह्मा जी से प्रार्थना की।
    ब्रह्मा जी ने उस पर कृपा करके उस पाप को चार भाग में बांट दिया था ।
    जिसमें प्रथम भाग अग्नि की ज्वाला में, दूसरा नदियों के लिए वर्ष के जल में,
    तीसरे पर्वतों में और चौथे भाग को स्त्री के रज में विभाजित करके इंद्र को शाप से मुक्ति प्रदान करवाई थी।
    इसलिए उस पाप को शुद्धि के लिए ही हर स्त्री को ॠषि पंचमी का व्रत करना चाहिए।
  2. कुछ लौकिक कथाओं में कहा जाता हैं की महाभारत काल में उत्तरा के गर्भ पर अश्वस्थामा के प्रहार से उसका गर्भ नष्ट हो गया था।
    इस कारण उत्तरा द्वारा इस व्रत को किया गया।
    जिसके बाद उनका गर्भ पुनः जीवित हुआ और हस्तिनापुर को राजा परीक्षित के रूप में उत्तराधिकारी मिला।
    राजा परीक्षित अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र थे।
    पुन: जन्म मिलने के कारण इन्हें गर्भ में ही द्विज कहा गया था।
    इस तरह इस व्रत के पालन से उत्तरा गर्भपात के दोष से मुक्त होती हैं।

इस प्रकार दोषों की मुक्ति के साथ- साथ संतान प्राप्ति एवम सुख सुविधाओं की प्राप्ति, सौभाग्य के लिए भी इस व्रत का पालन किया जाता हैं।
इस व्रत का महत्व जानने के बाद सभी स्त्रियों को इस व्रत का पालन करना चाहिये. यह व्रत जीवन की दुर्गति को समाप्त कर पाप मुक्त जीवन देता हैं।

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