शिक्षा
BHU : पूर्व कुलपति के कार्यकाल की जांच तेज, नियुक्तियों की वैधता पर उठे सवाल
वाराणसी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के पूर्व कुलपति प्रो. सुधीर कुमार जैन के कार्यकाल में की गई एक पदोन्नति को अवैध ठहराए जाने के बाद विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था गहरे प्रश्नों के घेरे में आ गई है। न्यायालय ने स्पष्ट टिप्पणी की कि कुलपति को प्रदत्त आपात शक्तियों का उपयोग नियमित नियुक्तियों और पदोन्नतियों के लिए नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के बाद पिछले कुछ वर्षों में इसी प्रावधान के तहत लिए गए सैकड़ों निर्णयों की वैधता पर संशय उत्पन्न हो गया है।
प्रो. सुधीर कुमार जैन के कार्यकाल के दौरान लंबे समय तक कार्यकारी परिषद (ईसी) का गठन नहीं हो सका था। इसी अवधि में कुलपति ने बीएचयू अधिनियम की धारा 7 सी (5) के अंतर्गत आपात शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कई महत्वपूर्ण प्रशासनिक निर्णय लिए। करियर एडवांसमेंट स्कीम (सीएएस) के तहत 450 से अधिक एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर पदों पर पदोन्नतियां प्रदान की गईं।
इसी क्रम में विभिन्न संस्थानों के निदेशकों की नियुक्तियां की गईं और उन्हें अहम दायित्व सौंपे गए। कई विभागों और संकायों में 350 से अधिक नई नियुक्तियां तथा जिम्मेदारियों का हस्तांतरण कार्यकारी परिषद की पूर्व स्वीकृति के बिना किया गया। बाद में जब नई कार्यकारी परिषद का गठन हुआ तो उसने पूर्व कुलपति द्वारा आपात शक्तियों के तहत लिए गए अधिकांश निर्णयों को अनुमोदन दे दिया।
कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि जब उच्च न्यायालय ने मूल प्रक्रिया को ही विधि-विरुद्ध और शक्तियों का दुरुपयोग करार दिया है, तब कार्यकारी परिषद द्वारा बाद में दी गई स्वीकृति भी विधिक कसौटी पर कमजोर पड़ सकती है। इससे विश्वविद्यालय की प्रशासनिक संरचना में व्यापक बदलाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
न्यायालय के आदेश के बाद वे शिक्षक और अभ्यर्थी, जिन्हें चयन या पदोन्नति में अवसर नहीं मिला था, अब इस निर्णय को आधार बनाकर न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं। एक साथ सैकड़ों नियुक्तियों और पदोन्नतियों पर प्रश्नचिह्न लगने से विश्वविद्यालय की अकादमिक और प्रशासनिक साख प्रभावित हुई है। यदि चयन समितियों के गठन को अवैध माना जाता है, तो वर्तमान में कार्यरत कई निदेशकों और पदाधिकारियों के पद भी संकट में आ सकते हैं।
कानूनी जानकारों के अनुसार यदि चयन समिति का गठन ही नियमविरुद्ध था तो उसके माध्यम से की गई नियुक्तियां स्वतः निरस्त मानी जा सकती हैं। प्रशासनिक सुविधा को कानून के शासन का विकल्प नहीं माना जा सकता। विश्वविद्यालय प्रशासन अब इस जटिल कानूनी स्थिति से निपटने के उपायों पर विचार कर रहा है। यह भी देखना होगा कि विश्वविद्यालय इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देता है या पूर्व प्रक्रियाओं की व्यापक समीक्षा करता है।
उच्च न्यायालय का यह निर्णय विश्वविद्यालय के लिए प्रशासनिक झटके के समान माना जा रहा है। पूर्व कुलपति के कार्यकाल में आपात शक्तियों के प्रयोग से की गई सभी नियुक्तियां और पदोन्नतियां अब वैधता की कसौटी पर खड़ी हैं। जो अभ्यर्थी इन प्रक्रियाओं में सफल नहीं हो सके थे, वे भी अब कानूनी विकल्प तलाश सकते हैं।
विश्वविद्यालय को उन सभी चयन समितियों के गठन की समीक्षा करनी पड़ सकती है जो कार्यकारी परिषद की अनुपस्थिति में गठित की गई थीं। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि कुलपति की आपात शक्तियां नियमित प्रशासनिक कार्यों, जैसे पदोन्नति, के लिए प्रयोज्य नहीं हैं। भविष्य में कोई भी कुलपति कार्यकारी परिषद को दरकिनार कर मनमाने ढंग से नियुक्तियां नहीं कर सकेगा।
यह निर्णय कार्यकारी परिषद की वैधानिक भूमिका को पुनर्स्थापित करता है और यह संकेत देता है कि केवल बाद में अनुमोदन प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं होगा यदि मूल प्रक्रिया ही त्रुटिपूर्ण हो। चयन समितियों में संबंधित विषय के विशेषज्ञों की उपस्थिति अनिवार्य होगी। असंगत विशेषज्ञों के माध्यम से की गई नियुक्तियां भी चुनौती के दायरे में आ सकती हैं। हालांकि जिन शिक्षकों की पदोन्नति पर प्रभाव पड़ेगा, वे न्यायिक राहत या यथास्थिति बनाए रखने की मांग कर सकते हैं। साथ ही, केंद्रीय विश्वविद्यालयों में आपात शक्तियों के उपयोग को लेकर भविष्य में कड़े दिशा-निर्देश जारी होने की संभावना भी जताई जा रही है।
