गोरखपुर
एम्स गोरखपुर में पहली बार ऑर्थोग्नाथिक सर्जरी से बदली युवक की ज़िंदगी, चेहरे को मिला नया रूप
गोरखपुर। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) गोरखपुर में पहली बार ऑर्थोग्नाथिक फेशियल सर्जरी के माध्यम से जन्मजात चेहरे की विकृति से पीड़ित एक युवक को नया जीवन मिला है। यह जटिल और उच्च स्तरीय सर्जरी सामान्यतः देश के चुनिंदा बड़े अस्पतालों में ही संभव हो पाती है। इस तकनीक के माध्यम से जबड़े को छोटा-बड़ा करना, चेहरे के संतुलन को सुधारना, होंठ और नाक की बनावट को बेहतर बनाना तथा बुढ़ापे के प्रभाव को कम किया जाता है। आमतौर पर ऐसी सर्जरी सौंदर्यवर्धन के लिए कराई जाती है, लेकिन इस मामले में इसका उपयोग एक गंभीर चिकित्सीय समस्या के समाधान के लिए किया गया।
यह मामला कुशीनगर के बालुही निवासी 22 वर्षीय युवक से जुड़ा है, जिसकी समस्या जन्म के कुछ वर्षों बाद शुरू हुई थी। दोनों ओर के जबड़े की हड्डी खोपड़ी से जुड़ जाने (टीएमजे एंकिलोसिस) और निचला जबड़ा विकसित न हो पाने के कारण उसका मुंह पूरी तरह बंद रहता था। निचला जबड़ा गले में धंसा हुआ था, जिससे उसे भोजन करने और सांस लेने में भारी कठिनाई होती थी। पिछले करीब 15 वर्षों से युवक इस समस्या से जूझ रहा था और भोजन ठीक से न कर पाने के कारण वह कुपोषण का शिकार हो गया था।
युवक के भाई ने उसे दिल्ली और लखनऊ सहित कई स्थानों पर चिकित्सकों को दिखाया, लेकिन राहत नहीं मिली। 13 वर्ष की आयु में एक निजी अस्पताल में ऑपरेशन कराया गया था, इसके बावजूद समस्या दोबारा उत्पन्न हो गई। काफी परेशान होने के बाद परिजनों को जानकारी मिली कि गोरखपुर स्थित एम्स में इसका इलाज संभव है। इसके बाद युवक को एम्स गोरखपुर लाया गया, जहां दंत चिकित्सा विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर एवं मैक्सिलोफेशियल सर्जन डॉ. शैलेश कुमार ने उसकी जांच की।
स्कैन और परीक्षण में पाया गया कि निचला जबड़ा पूरी तरह विकसित नहीं हुआ था और खोपड़ी की हड्डी उससे जुड़ चुकी थी। इससे युवक को सांस लेने और सोने में अत्यधिक परेशानी हो रही थी, जिसे चिकित्सा भाषा में ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एपनिया कहा जाता है। इस स्थिति में चेहरे की बनावट भी प्रभावित होकर ‘बर्ड फेस डिफॉर्मिटी’ जैसी हो जाती है।
डॉ. शैलेश कुमार ने इलाज को दो चरणों में करने की योजना बनाई। पहले चरण में इंट्राओरल डिस्ट्रैक्शन ऑस्टियोजेनेसिस तकनीक से निचले जबड़े को विकसित किया गया। दूसरे चरण में गैप आर्थ्रोप्लास्टी द्वारा जुड़ी हुई हड्डियों को अलग किया गया तथा स्लाइडिंग जीनियोप्लास्टी से ठुड्डी के आकार को संतुलित किया गया। एनेस्थीसिया विभाग के सहयोग से इस जटिल प्रक्रिया की तैयारी की गई, क्योंकि ऐसे मरीजों को बेहोश करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण होता है।
अप्रैल 2025 में पहली सर्जरी के दौरान ‘अवेक फाइबरऑप्टिक नेजल इंट्यूबेशन’ तकनीक से सांस की नली डाली गई और इसके बाद मरीज को पूर्ण बेहोश किया गया। निचले जबड़े में एक विशेष उपकरण लगाया गया, जिसे प्रतिदिन लगभग एक मिलीमीटर घुमाया गया। इससे हड्डी धीरे-धीरे आगे बढ़ी और नई हड्डी बनने लगी। इसके परिणामस्वरूप जबड़ा आगे आने लगा, चेहरे का निचला हिस्सा उभरने लगा और सांस लेने में सुधार हुआ। खर्राटों की समस्या भी काफी कम हो गई।
जनवरी 2026 में दूसरी सर्जरी की गई, जिसमें डिस्ट्रैक्टर को निकालकर जबड़े को अंतिम रूप दिया गया। इस दौरान चेहरे की नसों को सुरक्षित रखते हुए हड्डी के जुड़े हुए हिस्से को हटाया गया और ठुड्डी की बनावट को संतुलित किया गया। नई तकनीक के माध्यम से कान के पास चीरा लगाकर लगभग पांच घंटे में यह ऑपरेशन सफलतापूर्वक पूरा किया गया।
डॉ. शैलेश कुमार ने बताया कि समय रहते सही इलाज मिलने पर ऐसी स्थिति से बचा जा सकता है। ऑपरेशन के बाद जबड़े के आगे आने से गले के पीछे की जगह बढ़ गई, जिससे युवक की सांस सामान्य हो गई और वह अब चैन की नींद ले पा रहा है। स्लीप एपनिया जैसी गंभीर समस्या से भी उसे राहत मिली है। पहले जिसकी ठुड्डी गर्दन से मिली हुई प्रतीत होती थी, अब वहां स्पष्ट और संतुलित जबड़े की बनावट दिखाई देती है। युवक अब आत्मविश्वास के साथ मुस्कुराता है और सामान्य जीवन जी रहा है।
दंत विभाग के डॉ. श्रीनिवास ने पूरी चिकित्सकीय टीम को इस सफलता के लिए बधाई दी। एनेस्थीसिया विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. संतोष शर्मा, एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सीमा, जूनियर एकेडमिक रेजीडेंट डॉ. आशुतोष, नर्सिंग ऑफिसर पंकज और प्रतिभा ने सर्जरी में अहम भूमिका निभाई। दंत विभाग के सीनियर रेजीडेंट डॉ. प्रवीण कुमार तथा जूनियर रेजीडेंट डॉ. सुमित, डॉ. सौरभ और डॉ. प्रियंका त्रिपाठी भी टीम में शामिल रहे।
एम्स गोरखपुर की कार्यकारी निदेशक मेजर जनरल डॉ. विभा दत्ता ने दंत शल्य विभाग की टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह सफलता संस्थान की उच्च स्तरीय चिकित्सीय सेवाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की प्रतिबद्धता का प्रमाण है। इस उपलब्धि से क्षेत्र के लोगों को अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाएं घर के पास ही उपलब्ध होंगी। इस सर्जरी के माध्यम से दंत शल्य विभाग ने न केवल एक युवक को नया जीवन दिया है, बल्कि पूर्वांचल क्षेत्र में उन्नत तकनीक से होने वाली सर्जरी की संभावनाओं को भी नया आयाम प्रदान किया है।
