गोरखपुर
खजनी में श्रीमद्भागवत कथा का भव्य समापन
भक्ति, संगीत और भावनाओं से सराबोर हुआ खुटभार गांव*
गोरखपुर। जनपद के खजनी क्षेत्र के खुटभार गांव में भक्ति, प्रेम और समर्पण से ओतप्रोत एक दिव्य आयोजन का समापन हुआ। महेश्वरी फर्नीचर हाउस एवं अश्विनी हार्डवेयर परिवार द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत पुराण कथा का समापन एवं महा प्रसाद कार्यक्रम बड़े ही हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ संपन्न हुआ। नौ दिवसीय यह आयोजन गांव और आसपास के क्षेत्रों में भक्ति का केंद्र बन गया था, जहां हर दिन श्रद्धालु भक्तजनों की भीड़ उमड़ती रही।
इस पावन कथा का वाचन कथाव्यास आचार्य पंडित अरुणेश प्रताप मिश्र ‘अवधेश जी’ के मुखारविंद से हुआ। उनके मधुर, भावपूर्ण और ज्ञानवर्धक वचनों ने उपस्थित भक्तजनों के हृदय को भक्ति रस से भर दिया। कथा के अंतिम दिवस पर हवन यज्ञ का आयोजन विधि-विधानपूर्वक सम्पन्न हुआ, जिसमें सैकड़ों श्रद्धालुजन उपस्थित होकर आहुति प्रदान की और लोककल्याण की कामना की।

कार्यक्रम का संगीत मय वातावरण इसे और अधिक आध्यात्मिक बना गया। भजन गायक सचिदानंद सरस की सुरीली आवाज़ और उनके भावपूर्ण भजनों ने उपस्थित जनसमूह को भक्ति सागर में डुबो दिया। उनके द्वारा गाए गए “यशोदा वनले बाड़ी कान्हा के कोरिया में” जैसे भजनों पर श्रोतागण झूम उठे। संगीत की मिठास को और गहराई दी तबला वादक दिलीप सिन्हा ने, जिनकी लयकारी ने उपस्थित जनों को मंत्रमुग्ध कर दिया। दर्शकों ने उनकी कला को देखकर उन्हें “तबले के जाकिर हुसैन” की उपाधि तक दे डाली।
कार्यक्रम में मां सरस्वती की मधुर वीणा जैसी ध्वनि जब वातावरण में गूंजी, तो ऐसा लगा मानो स्वयं देवी का आशीर्वाद उस स्थल पर बरस रहा हो। पूरा परिसर भक्ति और संगीत से आलोकित हो उठा।

इस अवसर पर सक्षम मिश्र, शुभम पाठक सहित अन्य सहयोगियों का भी विशेष योगदान रहा, जिन्होंने पूरे आयोजन को सफल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कार्यक्रम के समापन पर श्रीमती शोभा देवी ने अपने समूचे परिवार की ओर से सभी आगंतुकों, भक्तजनों और सहयोगियों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया। उनके पुत्र एवं पुत्रवधू ने भी नम्रता पूर्वक सबका अभिनंदन किया और कहा कि “यह आयोजन केवल कथा नहीं, बल्कि प्रेम, एकता और श्रद्धा का उत्सव था।”
महा प्रसाद के वितरण के समय श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ पड़ी। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी के चेहरों पर भक्ति और प्रसन्नता की झलक साफ दिख रही थी। पूरे आयोजन स्थल को फूलों और रंगीन झालरों से सजाया गया था, जिससे वातावरण और भी अधिक पवित्र एवं आकर्षक बन गया।
खुटभार गांव में यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणास्रोत बन गया है — जहां भक्ति, सेवा और संस्कृति ने एक साथ संगम रचा।
