धर्म-कर्म
श्री लक्षचण्डी महायज्ञ में आयोजित 9 दिवसीय काशी कथा में तीर्थ दान का बताया गया महात्म्य
काशी के कण-कण में हैं शंकर – डा. श्यामगंगाधर बापट जी
वाराणसी। संकुलधारा पोखरा स्थित द्वारिकाधीश मंदिर में परम पूज्य महामंडलेश्वर स्वामी श्री प्रखर जी महाराज के सानिध्य में कोरोना महामारी के शमन हेतु चल रहे 51 दिवसीय विराट श्री लक्षचण्डी महायज्ञ की श्रृंखला में आयोजित 9 दिवसीय परम गोपनीय काशी कथा के तीसरे दिन गुरुवार को व्यासद्वय ने तीर्थ, दान, पिशाचलोक, गन्धर्वलोक, यमलोक आदि के महात्म्य का वर्णन किया।
व्यासपीठ के पूजन अर्चन के बाद कथा का प्रारम्भ करते हुए व्यास द्वय पंडित प्रवर विश्वेश्वर शास्त्री द्राविड़ एवं डा श्यामगंगाधर बापट जी ने पहले तीर्थों के महात्म्य को बताते हुए बताया कि जब देव पार्षद कोल्हापुर से होते हुए श्रीशैल पहुंचते हैं तो वहां से मां लक्ष्मी का आशीर्वाद लेकर तीर्थों की ओर निकल पड़ते हैं। इस दौरान तीर्थों के राजा प्रयाग, अयोध्या, द्वारिका, हरिद्वार, उज्जैन के महाकाल आदि तीर्थों का महत्व जानने के बाद जब अगस्त ऋषि के पास पहुंचते हैं तो उनसे पूछते हैं की जब पृथ्वी पर इतने महत्वपूर्ण तीर्थ हैं तो आप काशी में ही सिर्फ वास क्यों करते है।
जिस पर अगस्त ऋर्षि तीर्थों का महत्व को बताते हुए कहते हैं कि मानव जीवन को तारने वाले को तीर्थ कहते हैं। तीर्थ माता- पिता, गुरु, धर्म, दान कुछ भी हो सकता है जो भी मानव जीवन को तारता है वह तीर्थ कहलाता है। वैसे तो तीर्थों के राजा प्रयाग हैं। इसलिए इसे प्रयागराज कहते हैं। लेकिन काशी के तीर्थ महत्व की अलग ही महात्म्य है। यहां के जल ही अत्यंत शक्तिशाली होते हैं। जो फल अमृतपान से भी नही मिलता वह काशी के जल से मिलता है। यहाँ का जल ग्रहण मात्र करने से ही मां के स्तनपान जैसा फल मिलता है। क्योंकी काशी से बड़ी कोई नगरी नहीं, विश्वेश्वर से बड़े कोई देव नहीं और दान से बड़ा कोई पुण्य नहीं और ये तीनों ही सिर्फ काशी में ही मिलते हैं। काशी के कण-कण और पग-पग में तीर्थ हैं। इसलिए कहते हैं कि यहां कण-कण में शिव का वास है। यहाँ पहले सिगरा क्षेत्र श्रीगिरी, गोदौलिया क्षेत्र गोदावरी तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध था। इसी तरह सभी क्षत्रों में अलग-अलग तीर्थ थे।
उन्होंने दान के महत्व को बताते हुए बताया कि दान से बड़ा कोई पुण्य नहीं होता इसलिए दान करने के बाद पश्चाताप नहीं करना चाहिए, न ही यह सोचना चहिये की इससे कम भी दान किया जा सकता था। यह सोचना भी पाप होता है। ऐसा सोचने वाले पिशाचों की श्रेणीं में आते है। जिस प्रकार स्नान से तन की, ध्यान से मन की वैसे ही दान से धन की शुद्धि होती है।
उन्होंने गन्धर्वलोक का भी महत्व बताते हुए बताया कि गंधर्वलोक में रहने वाले गायन वादन कर ईश्वर को प्रसन्न करते हैं। उन्होने बताया कि गायन वादन सिर्फ मनोरंजन का ही साधन नही अपितु मोक्ष का भी साधन है। यदि हरिहर के मंदिर में निष्ठा से गायन किया जाय तो उससे भी मोक्ष की प्राप्ति होती है। यदि मोक्ष नहीं मिलता तो शिव के रुद्र गण बनने का सौभाग्य तो अवश्य ही मिलता है।
व्यासद्वय ने यमलोक का महात्म्य बताते हुए बताया कि यमराज का सिर्फ रौद्र रूप ही नही बल्कि सौम्य रूप भी है। यम का अर्थ ही है संयमित करना और यमराज दुष्टात्माओं को संयमित करते हैं इसलिए उनके लिए यमराज हैं और पुण्यात्माओं के लिए धर्मराज हैं।
कार्यक्रम में परम पूज्य महामंडलेश्वर स्वामी प्रखर जी महाराज, स्वामी पूर्णांनन्द जी महाराज, महायज्ञ समिति के अध्यक्ष श्री कृष्ण कुमार खेमका, सचिव संजय अग्रवाल, कोषाध्यक्ष सुनील नेमानी, संयुक्त सचिव राजेश अग्रवाल, डॉ सुनील मिश्रा, अमित पसारी, शशिभूषण त्रिपाठी, अनिल भावसिंहका, मनमोहन लोहिया, अनिल अरोड़ा, विकास भावसिंहका आदि लोग उपस्थित रहे।
वहीं परम पूज्य महामंडलेश्वर स्वामी श्री प्रखर जी महाराज सानिध्य हो रहा 100 कुंडीय श्री लक्ष्यचंडी महायज्ञ के साथ वृंदावन से आए हुए श्री राधासर्वेस्वर लीला संस्थान, मण्डल संचालक रासाचार्य स्वामी श्री शिवदयाल जी स्वामी श्री गिरिराज जी द्वारा श्री मद भागवत महापुराण पर आधारित श्रीकृष्ण रासलीला के अन्तर्गत भगवान श्रीकृष्ण के मणिखम्म लीला का मंचन किया गया। जिसमें दिखाया गया कि श्रीकृष्ण धीरे धीरे बड़े हो रहे हैं, चलना भी सीख लिया अब गोकुल गांव में वो ब्रज गोपियों के घर में घुसकर, बाल लीला करते हैं, एक गोपी के घर जाकर माखन का भोग लगाते हैं। उस गोपी के घर में एक मणी का खम्म होता है भगवान उस मणी के खम्म के सामने खड़े होकर माखन खाते हैं तो उसमें श्याम सुन्दर श्री कृष्ण को अपना रूप दिखाई देता है। भगवान सोचते हैं कि जिस गोपी के घर मैं मकान चुरा कर खा रहा हूं ये उस गोपी का लड़का है,ये अपनी मईया से बोल देगा की कान्हा माखन चुरा कर खा रहें हैं तो भगवान उस मणी मैं अपने रूप को माखन खिलाने लग जाते हैं और कहते हैं ले तू भी माखन खा पर अपनी मईया से मत बोलना नहीं तो तेरी मैया मेरी मैया से बोलेगी और फिर मेरी मैया मारेगी मुझे सखी ब्रजगोपियां पीछे से खड़े होकर प्रभु की बाल लीला का आंनद लेती हैं।
