गोरखपुर
रिटायर्ड आयुर्वेदिक चिकित्साधिकारी से एक करोड़ से अधिक की ठगी
गोरखपुर में साइबर ठगों ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ और मनी लॉन्ड्रिंग के झूठे आरोपों का भय दिखाकर एक सेवानिवृत्त आयुर्वेदिक चिकित्सा अधिकारी को 1,57,99,952.80 रुपये की चपत लगा दी। पीड़िता डॉ. मंजुला श्रीवास्तव (पत्नी स्व. शैलेष कुमार श्रीवास्तव), निवासी सी-178/78, 5 कैनाल रोड, थाना कैंट, ने बताया कि 13 फरवरी 2026 को उन्हें व्हाट्सएप वीडियो कॉल प्राप्त हुई। कॉल करने वाले व्यक्ति ने स्वयं को एटीएस/एनआईए/ईडी का अधिकारी बताते हुए उनके केनरा बैंक खाते में 50 लाख रुपये के कथित लेन-देन और मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप लगाया तथा “डिजिटल अरेस्ट” की धमकी दी।
पीड़िता के अनुसार ठगों ने उन्हें लगातार निगरानी में रखने, किसी से बातचीत न करने और घर से बाहर न निकलने का दबाव बनाया। उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि समस्त धनराशि “लीगलाइजेशन” प्रक्रिया के तहत ट्रांसफर कराई जा रही है और जांच पूरी होने के बाद वापस कर दी जाएगी। तकनीकी रूप से दक्ष न होने की बात स्वीकारते हुए उन्होंने बताया कि इसी कमजोरी का लाभ उठाकर उन्हें मानसिक दबाव में रखा गया।
13 फरवरी से 21 फरवरी के बीच आरोपियों ने उनकी सभी सावधि जमा (एफडी) तुड़वाकर अलग-अलग खातों में धनराशि स्थानांतरित करा ली। 18 फरवरी को यूनियन बैंक खाते से 30 लाख रुपये आईसीआईसीआई बैंक खाते में आरटीजीएस के माध्यम से ट्रांसफर कराए गए। 20 फरवरी को 80 लाख रुपये आईसीआईसीआई बैंक खाते में आरटीजीएस किए गए। 21 फरवरी को एसबीआई खाते से 47,99,952.80 रुपये आईसीआईसीआई बैंक खाते में आरटीजीएस के जरिए भेजे गए। इस प्रकार कुल 1.57 करोड़ रुपये से अधिक की रकम हड़प ली गई।
ठगों ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की फर्जी रसीदें भी भेजीं, जिन पर एक ही नंबर अंकित था। कॉल करने वाला स्वयं को पुणे से बात करने वाला बताता रहा और 24 फरवरी तक धनराशि वापस करने का आश्वासन देता रहा, लेकिन इसके बाद संपर्क पूरी तरह समाप्त हो गया।
पीड़िता के मुताबिक उन्हें अलग-अलग मोबाइल नंबरों से कॉल प्राप्त होते रहे। उन्होंने आशंका जताई है कि इतनी बड़ी धनराशि के ट्रांसफर में किसी बैंक कर्मी की मिलीभगत भी हो सकती है।
साइबर थाना गोरखपुर में अज्ञात आरोपियों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर जांच प्रारंभ कर दी गई है। मामले की जांच निरीक्षक कपिल देव चौधरी को सौंपी गई है। पुलिस का कहना है कि ट्रांजेक्शन ट्रेल, कॉल डिटेल्स और संबंधित खातों की जांच कर धनराशि की रिकवरी के प्रयास किए जा रहे हैं। यह प्रकरण एक बार फिर स्पष्ट करता है कि “डिजिटल अरेस्ट” जैसी कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं होती और ऐसी धमकियों से सतर्क रहना आवश्यक है।
