धर्म-कर्म
रक्षाबंधन की परंपरा और महत्व जानते हैं आप ?
भारत में रक्षाबंधन मनाने की परंपरा सदियों पुरानी है। महाभारत से जुड़ी कथा के अनुसार, एक बार द्रौपदी ने कृष्ण की चोट को ठीक करने के लिए उनकी कलाई पर अपनी पोशाक से एक कपड़ा फाड़ कर बांध दिया था। भगवान श्री कृष्णा इस बात से इतनी ज्यादा खुश और प्रभावित हुए कि उन्होंने द्रौपदी को अपनी बहन बना लिया और उनकी रक्षा करने की जिम्मेदारी ली। कहते हैं कि तभी से रक्षाबंधन का त्योहार मनाने की परंपरा चली आ रही है।
पद्म पुराण स्कंद पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु के असुरराज बलि बहुत बड़े भक्त थे। एक बार अपनी भक्ति की परीक्षा लेने के लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया। इसके बदले उन्होंने असुरराज बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी। बिना किसी हिचकिचाहट के असुरराज बलि ने यह स्वीकार कर लिया। भगवान विष्णु ने तीनों लोकों के अपने दो पगों में नाप लिया और तीसरा पग राजा बलि के सिर पर रखकर उन्हें पाताल लोक का राजा बना दिया। भगवान विष्णु से राजा बलि पाताल लोक में साथ रहने का वरदान मांगा। जब भगवान विष्णु वापस नहीं लौटे को माता लक्ष्मी दुखी हो गई।

भगवान विष्णु को वापस स्वर्ग ले जाने के लिए उन्होंने गरीब ब्राह्मणी का रूप धारण कर राजा बलि के पास पहुंची। इस बाद माता लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बांध दी। राखी के बदले मां लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को वापस स्वर्ग ले जाने का वरदान मांगा। उसके बाद राजा बलि ने राखी के बंधन को निभाते हुए भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को वापस स्वर्ग भेज दिया। इसके बाद से हिंदू धर्म में रक्षाबंधन का त्योहार मनाने लगे।
