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गाजीपुर

मिट्टी के बर्तनों की विरासत खतरे में, कुम्हारों का हुनर उपेक्षित

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गाजीपुर। बहरियाबाद क्षेत्र और इसके आस-पास के गांवों में बसे कुम्हार, जो अपनी आजीविका मिट्टी के बर्तनों के जरिए चलाते हैं, आज प्लास्टिक के घरेलू बर्तनों के प्रचलन के कारण एक जून की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

कुम्हार के चाक को सदियों से मिट्टी को आकार देने के लिए उपयोग किया जाता रहा है। यह चाक न केवल मिट्टी के बर्तनों के निर्माण का प्रमुख उपकरण है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक भी है। घड़ा, सुराही, तवा, हांडी, और कुल्हड़ जैसे बर्तनों का उपयोग भारतीय घरों में लंबे समय से होता आ रहा है।

मिट्टी के बर्तनों के स्वास्थ्य लाभ
गर्मियों में मिट्टी के घड़े और सुराही में पानी पीने से स्वास्थ्य पर कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। आयुर्वेद के अनुसार, मिट्टी के बर्तनों में भोजन पकाने से उसमें ऐसे पोषक तत्व जुड़ते हैं जो शरीर को कई बीमारियों से बचाते हैं। हांडी में पकाया गया भोजन न केवल पौष्टिक होता है बल्कि इसका स्वाद भी खास होता है। यही कारण है कि आज भी कई लोग हांडी में बने व्यंजनों को प्राथमिकता देते हैं।

कुम्हारों की हालत बदतर
प्लास्टिक और स्टील के बढ़ते चलन ने कुम्हारों की रोजी-रोटी पर गहरा असर डाला है। यह स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि अब उनके हुनर के विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।

सरकार से अपील, संस्कृति को बचाने का समय
इस अमूल्य कला को बचाने और कुम्हारों के हुनर को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार को ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। अगर इस क्षेत्र में सही समर्थन और प्रोत्साहन दिया जाए, तो मिट्टी के बर्तनों की मांग फिर से बढ़ सकती है। इससे न केवल कुम्हारों को रोजगार मिलेगा बल्कि भारतीय संस्कृति की यह अद्भुत विरासत भी संरक्षित रह सकेगी।

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यह समय है जब लोग प्लास्टिक और अन्य सामग्रियों से बने बर्तनों की जगह मिट्टी के उत्पादों को प्राथमिकता दें। इससे न केवल पर्यावरण को लाभ होगा, बल्कि कुम्हारों को भी नई ऊर्जा मिलेगी।

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