गोरखपुर
त्रेता युग से जुड़ी है गोरखपुर में गुरु गोरखनाथ की खिचड़ी परंपरा
गोरखपुर। मकर संक्रांति के आते ही गोरखपुर की पहचान बन चुका खिचड़ी त्योहार एक बार फिर चर्चा में है। जानकारी के मुताबिक गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने की यह परंपरा हजारों वर्षों पुरानी मानी जाती है और इसकी जड़ें त्रेतायुग से जुड़ी हुई हैं। यही कारण है कि हर साल मकर संक्रांति पर गोरखनाथ मंदिर लोक आस्था का बड़ा केंद्र बन जाता है, जहां उत्तर प्रदेश, बिहार और नेपाल से लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। वर्ष 2026 में यह पर्व 15 जनवरी, गुरुवार को मनाया जा रहा है
गौरतलब है कि खिचड़ी चढ़ाने से जुड़ी कथा त्रेतायुग से जुड़ी बताई जाती है। मान्यता के अनुसार उस समय गुरु गोरखनाथ भिक्षाटन करते हुए हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा क्षेत्र में स्थित ज्वाला देवी मंदिर पहुंचे थे। देवी की ओर से भोजन की व्यवस्था की गई, लेकिन योगी गोरखनाथ ने केवल भिक्षा में मिले चावल और दाल को ही ग्रहण करने की इच्छा जताई और पानी गर्म करने को कहा। लोक विश्वास है कि उसी समय से ज्वाला देवी मंदिर में पानी के अपने आप उबलने की परंपरा प्रचलित है, जिसे आज भी श्रद्धालु चमत्कार के रूप में देखते हैं।

बता दें कि भिक्षा लेकर गुरु गोरखनाथ गोरखपुर पहुंचे और राप्ती-रोहिन के तट पर धूनी रमाई। मकर संक्रांति के दिन अन्न दान की जो परंपरा शुरू हुई, वही आगे चलकर खिचड़ी चढ़ावे के रूप में स्थापित हो गई। यही परंपरा आज गोरखपुर की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान बन चुकी है।
जानकारी के मुताबिक गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर नाथ संप्रदाय का प्रमुख केंद्र है। यहां मकर संक्रांति से लेकर महाशिवरात्रि तक खिचड़ी मेला लगता है, जो केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों का भी केंद्र बन जाता है।
इस दौरान झूले, दुकानें, सांस्कृतिक आयोजन और अस्थायी रोजगार के अवसर पैदा होते हैं, जिससे पूरा क्षेत्र जीवंत हो उठता है।
श्रद्धालुओं की मान्यता है कि खिचड़ी चढ़ाने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और चढ़ाया गया अन्न वर्ष भर जरूरतमंदों में वितरित किया जाता है, जिससे सेवा और दान की भावना मजबूत होती है।
बता दें कि इस परंपरा का संबंध नेपाल से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। नेपाल के गोरखा क्षेत्र से राजपरिवार की ओर से खिचड़ी भेजने की परंपरा 17 वीं शताब्दी से चली आ रही है। लोक मान्यता के अनुसार गुरु गोरखनाथ ने नेपाल के एक राजकुमार को वरदान दिया था, जिसके बाद वे वहां के आराध्य बन गए। तभी से नेपाल की ओर से खिचड़ी भेजी जाती है।
मंदिर परंपरा के अनुसार सबसे पहले पीठाधीश्वर और उसके बाद नेपाल की ओर से आई खिचड़ी अर्पित की जाती है।2026 के आयोजन को लेकर प्रशासन पूरी तरह सतर्क है। बता दें कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और गोरखनाथ मंदिर के पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने स्वयं मंदिर परिसर का निरीक्षण कर सुरक्षा, साफ-सफाई, पार्किंग, यातायात, स्वास्थ्य सेवाओं और भीड़ प्रबंधन को लेकर स्पष्ट निर्देश दिए हैं।
जानकारी के मुताबिक पुलिस, पीएसी और प्रशासनिक अमला अलर्ट मोड में है, पार्किंग स्थलों का चिन्हांकन किया गया है और मंदिर की सजावट लगभग पूरी कर ली गई है। इस बार भी खिचड़ी मेला भव्य और व्यवस्थित रूप में आयोजित करने की तैयारी किया गया है, ताकि श्रद्धालुओं को किसी तरह की असुविधा न हो और परंपरा की गरिमा बनी रहे श्री गुरु गोरखनाथ खिचड़ी मेला सदियों से चली आ रही है
