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गाजीपुर

जितिया व्रत में सतपुतिया का महत्व और परंपराएं

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बहरियाबाद (गाजीपुर)। हिंदू धर्म में जिउतिया (जितिया) पर्व का विशेष महत्व है। यह व्रत मुख्य रूप से माताएं अपने संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं। इस पर्व को जीवित्पुत्रिका के नाम से भी जाना जाता है, जो उत्तर भारत के राज्यों, विशेषकर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में प्रमुख रूप से मनाया जाता है।

जिउतिया माई की पूजा का मुख्य उद्देश्य संतान की रक्षा करना है। यह व्रत तीन दिनों तक चलता है और इसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है। पहले दिन माताएं स्नान करके शुद्ध भोजन ग्रहण करती हैं। दूसरे दिन, जिसे खर जिउतिया कहते हैं, माताएं निर्जला (बिना पानी के) व्रत रखती हैं। इस दिन वे न तो अन्न ग्रहण करती हैं और न ही पानी पीती हैं। यह कठोर तपस्या उनकी अगाध श्रद्धा और बच्चों के प्रति गहरे प्रेम को दर्शाती है। तीसरे दिन व्रत का पारण किया जाता है, जिसमें सूर्योदय के बाद ही भोजन और जल ग्रहण किया जाता है।

जिउतिया माई की कथा

इस व्रत से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं हैं। एक प्रसिद्ध कथा जीमूतवाहन की है, जो एक महान राजा थे और उन्होंने गरुड़ के चंगुल से एक नाग माता के पुत्र की रक्षा की। उनकी निस्वार्थ भक्ति और त्याग के कारण जीवित्पुत्रिका व्रत का प्रचलन हुआ।

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एक अन्य कथा में एक चील और सियारिन की कहानी है। दोनों ने व्रत रखने का संकल्प लिया, लेकिन सियारिन भूख बर्दाश्त नहीं कर सकी और चोरी-छिपे भोजन कर लिया। जबकि चील ने पूरी निष्ठा से व्रत रखा। परिणामस्वरूप सियारिन की संतानें नहीं बचीं, जबकि चील की संतानें जीवित रहीं।

पूजा विधि और परंपराएं

जिउतिया माई की पूजा में मिट्टी से बनी उनकी मूर्ति या प्रतिमा स्थापित की जाती है। पूजा के दौरान धूप-दीप, फल, फूल और विशेष पकवान जैसे सरगही, पूरी, खीर और मिठाइयां चढ़ाई जाती हैं। माताएं समूह में बैठकर व्रत की कथा सुनती हैं और जिउतिया माई से अपने बच्चों की सुरक्षा और कल्याण की प्रार्थना करती हैं।

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जिउतिया व्रत के पहले दिन सतपुतिया का विशेष महत्व है। खाय-नहाय के दिन सतपुतिया, जो एक प्रकार की तोरई होती है, को शुभ माना जाता है। इसे खाने से सुख और समृद्धि प्राप्त होती है। यह सब्जी बहुत पौष्टिक होती है और इसमें पानी की मात्रा अधिक होती है, जिससे अगले दिन निर्जला व्रत रखने में मदद मिलती है और शरीर हाइड्रेट रहता है।

यह पर्व भारतीय संस्कृति में माताओं के अटूट स्नेह और त्याग का प्रतीक है। जिउतिया व्रत न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह परिवार और समाज में एकजुटता और आपसी प्रेम को बढ़ावा देता है।

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